
नई दिल्ली, 24 जनवरी (अशोक “अश्क”) हाई कोर्ट जजों के तबादलों को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंधों पर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के कार्यकाल में लिए गए एक कॉलेजियम फैसले पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कार्यपालिका के कथित दखल की कड़ी आलोचना की है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी जज का तबादला सरकार के लिए “असुविधाजनक” फैसले देने के कारण किया जाता है और यह बात कॉलेजियम प्रस्ताव में दर्ज होती है, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कॉलेजियम प्रणाली की निष्पक्षता दोनों पर गहरा असर पड़ता है।मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस अतुल श्रीधरन के एमपी हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट तबादले से जुड़ा है। विवाद तब बढ़ा जब पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया था। जस्टिस भुइयां ने इसे कॉलेजियम फैसलों में सरकारी प्रभाव की स्पष्ट स्वीकारोक्ति करार दिया।

पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में आयोजित जी.वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि किसी जज को केवल इसलिए एक हाई कोर्ट से दूसरे हाई कोर्ट क्यों भेजा जाए, क्योंकि उसने सरकार के पक्ष में न होने वाले फैसले सुनाए। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट जजों की पोस्टिंग और ट्रांसफर पूरी तरह न्यायपालिका का विषय है और इसका उद्देश्य केवल न्याय के बेहतर प्रशासन से जुड़ा होना चाहिए।उन्होंने याद दिलाया कि एनजेएसी फैसले के जरिए जब न्यायपालिका ने कॉलेजियम सिस्टम को बदलने की कोशिश को खारिज कर दिया है, तब कॉलेजियम सदस्यों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना है और इस पर किसी भी तरह का समझौता लोकतंत्र के लिए घातक होगा।

