
पटना, 01 फरवरी (अविनाश कुमार) बिहार विधान सभा के बजट सत्र में उठे ‘खजाना खाली’ विवाद ने आखिरकार बड़ा मोड़ ले लिया है। मीडिया में खबर प्रमुखता से आने के बाद बिहार सरकार बैकफुट पर दिखी और अब वित्त विभाग ने अपना पुराना आदेश निरस्त कर संशोधित पत्र जारी कर दिया है। इस घटनाक्रम ने सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की आग को और भड़का दिया है।

सरकार की ओर से जारी नए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि वित्तीय वर्ष के अंतिम माह—फरवरी और मार्च—में कोषागारों में बड़ी संख्या में विपत्र प्रस्तुत होते हैं। इनमें वेतन, पेंशन, आकस्मिक व्यय, योजनागत भुगतान और पूर्व के बकाया दावे शामिल रहते हैं। इस कारण विपत्रों की जांच और पारित करने में व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती हैं। विभाग ने बताया कि 6 फरवरी को पत्रांक-1354 के तहत निधि निकासी एवं व्यय नियंत्रण संबंधी दिशा-निर्देश वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से जारी किए गए थे।

हालांकि बाद में पत्रांक-2182 को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई, जिससे वेतन और पेंशन के अतिरिक्त अन्य भुगतानों पर रोक की आशंका जताई जाने लगी। अब सरकार ने 27 फरवरी से उक्त पत्र को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है, ताकि किसी प्रकार का संशय न रहे।इधर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। राष्ट्रीय जनता दल के एमएलसी सुनील सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार का खजाना खाली हो चुका है और जनता का पैसा बर्बाद कर दिया गया है। वहीं राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी बड़ी राशि कहां खर्च हुई कि सरकार को ऐसा कदम उठाना पड़ा। उन्होंने Comptroller and Auditor General of India (CAG) रिपोर्ट का हवाला देते हुए ₹72,000 करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया।सरकार के इस यू-टर्न ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह महज प्रशासनिक स्पष्टीकरण है या आर्थिक संकट की आहट?

