पटना,1 सितम्बर (सेंट्रल डेस्क) कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके घड़ियालों के लिए अब बिहार की गंडक नदी नई उम्मीद बन गई है। एक दशक पहले जहां इनकी संख्या गंडक नदी में महज 10 थी, वहीं 2025 तक यह बढ़कर 1000 के पार पहुंच चुकी है। इनमें से करीब 400 घड़ियाल वयस्क हैं। अब गंडक, देश में चंबल नदी के बाद घड़ियालों का दूसरा सबसे बड़ा आश्रय स्थल बन गई है।

2010 में जब पहली बार गंडक नदी में सर्वे हुआ, तब स्थिति चिंताजनक थी। लेकिन 2014-15 में जब बिहार सरकार और वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने संरक्षण का अभियान शुरू किया, तब उम्मीद की किरण जगी। पटना के जैविक उद्यान से लाए गए 30 किशोर घड़ियालों को गंडक में छोड़ा गया। धीरे-धीरे इनका प्रजनन शुरू हुआ और आज गंडक में घड़ियालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
वाल्मीकिनगर से सोनपुर तक फैली गंडक नदी में 2018 से 2025 तक कुल 876 घड़ियाल छोड़े गए। अकेले 2025 में ही 174 छोड़े गए। आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2025 तक इनकी संख्या में 588% वृद्धि हुई है।
वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के डॉ. समीर सिन्हा और वन विभाग की टीम ने नियमित निगरानी, अंडों की सुरक्षा और स्थानीय सहभागिता के माध्यम से इस बदलाव को संभव बनाया। नदी के किनारे रेत के टीलों में बनाए गए घोंसलों की सुरक्षा की जाती है, ताकि अंडों से सुरक्षित रूप से बच्चे निकल सकें।
नेपाल में घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम ज्यादा सफल नहीं रहा। वहीं भारत में खासकर बिहार की गंडक नदी ने इस प्रजाति को जीवनदान दिया है। यह भारत की उन सात जगहों में से एक है, जहां घड़ियाल प्रजनन करते हैं।
घड़ियाल इंसानों से संघर्ष नहीं करता, केवल मछलियां खाता है और साफ, तेज धार वाली नदियों को पसंद करता है। नर घड़ियाल के सिर पर घड़े जैसी आकृति होती है, जिससे इसका नाम पड़ा।
गंडक नदी का यह परिवर्तन केवल संरक्षण प्रयासों की सफलता नहीं, बल्कि यह बताता है कि योजनाबद्ध और वैज्ञानिक पहल से विलुप्त होती प्रजातियों को भी बचाया जा सकता है। अब जरूरत है इस कार्य को और व्यापक रूप देने की, ताकि गंडक जैसे उदाहरण अन्य नदियों के लिए प्रेरणा बनें।

