नई दिल्ली, 22 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) बिहार के ऐतिहासिक घाटों की छठ पर्व में विशेष महत्ता रही है, लेकिन अब यह सूर्य उपासना का पर्व सिर्फ एक क्षेत्रीय परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा बन गया है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली-NCR, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के घाट भी इस पर्व को उसी श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाकर इसे वैश्विक पहचान दिला रहे हैं। छठ पूजा आज आस्था, लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रति समर्पण का भावपूर्ण उत्सव बन चुका है।

दिल्ली-NCR: यमुना किनारे भक्तों का मेला
देश की राजधानी दिल्ली में छठ पूजा भव्य स्तर पर आयोजित की जाती है। कालंदी कुंज, आईटीओ घाट समेत कई स्थलों पर अस्थायी घाट बनाए जाते हैं। प्रशासन कृत्रिम जलाशयों की व्यवस्था करता है ताकि व्रतियों को अर्घ्य देने में कोई कठिनाई न हो। हजारों श्रद्धालु यमुना किनारे एकत्र होकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ते हैं।
काशी और प्रयागराज: आध्यात्मिकता और आस्था का संगम
उत्तर प्रदेश के काशी और प्रयागराज में छठ पर्व की धूम देखते ही बनती है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट से लेकर प्रयागराज के संगम घाट तक, लाखों श्रद्धालु डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। गंगा आरती और पारंपरिक गीतों से गूंजते घाट छठ की दिव्यता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं। नाव की सवारी के साथ भक्तिमय माहौल का अनुभव यहां अनूठा होता है।
झारखंड: प्रकृति की गोद में आस्था
झारखंड में भी छठ पूजा की परंपरा उतनी ही जीवंत है। जमशेदपुर के डोमुहानी घाट और रांची के जलाशयों में सूर्योपासना का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। सुवर्णरेखा और खरकाई नदियों के संगम स्थल को आकर्षक सजावट से सजाया जाता है, जिससे वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठता है।
महाराष्ट्र: जुहू चौपाटी पर उमड़ा आस्था का सागर
मुंबई के जुहू चौपाटी पर समुद्र की लहरों के बीच सूर्य को अर्घ्य देने का दृश्य देश में छठ पूजा के व्यापक विस्तार को दर्शाता है। हजारों श्रद्धालु यहां जुटते हैं, जिससे यह स्थल भारत के सबसे भव्य छठ घाटों में शामिल हो गया है।
पश्चिम बंगाल: हुगली किनारे सांस्कृतिक संगम
कोलकाता में हुगली नदी के बाबू घाट और रबीन्द्र सरोवर पर छठ पूजा बड़े पैमाने पर होती है। यहां बिहार और पूर्वांचल से आए समुदायों ने छठ को अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना लिया है। घाटों पर लोकगीतों की गूंज और प्रसाद की खुशबू इस पर्व को खास बना देती है।
छठ पूजा अब केवल बिहार या पूर्वांचल तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और विविधता का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

