
पटना, 17 मार्च (अविनाश कुमार) बिहार की सियासत में राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने बड़ा उलटफेर कर दिया है। एक सीट बचाने के लिए पूरी ताकत झोंकने के बावजूद तेजस्वी यादव को करारी हार का सामना करना पड़ा। एनडीए ने पांचों सीटों पर कब्जा जमाकर महागठबंधन को बड़ा झटका दिया है।इस हार के बाद तेजस्वी यादव की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि जिस विधायक की गैरमौजूदगी से पार्टी को नुकसान हुआ, उसके खिलाफ वे सख्त कार्रवाई भी नहीं कर सकते।

दरअसल, बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा बनाए रखने के लिए किसी पार्टी के पास कम से कम 10% यानी 25 विधायक होना जरूरी है। वर्तमान में आरजेडी के पास ठीक 25 विधायक हैं। अगर एक भी विधायक पर कार्रवाई होती है, तो संख्या घटकर 24 हो जाएगी और पार्टी नेता प्रतिपक्ष का दर्जा खो सकती है।ऐसी स्थिति में तेजस्वी यादव का पद भी खतरे में पड़ सकता है, जिसमें कैबिनेट मंत्री का दर्जा और सरकारी सुविधाएं शामिल हैं। यही वजह है कि विधायक की अनुपस्थिति के बावजूद पार्टी फिलहाल सख्त कदम उठाने से बच रही है।

हालांकि अतीत में ऐसी स्थिति अलग रही है। वर्ष 2010 में कम सीटें होने के बावजूद विपक्ष को मान्यता मिली थी, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में ऐसी संभावना बेहद कम मानी जा रही है।इधर, पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि मामले की समीक्षा की जा रही है, लेकिन कोई स्पष्ट निर्णय अभी सामने नहीं आया है।इस पूरे घटनाक्रम ने आरजेडी की स्थिति को असमंजस में डाल दिया है, जहां हर कदम राजनीतिक जोखिम से भरा नजर आ रहा है।

