नई दिल्ली, 06 नवम्बर (अशोक “अश्क”) तकनीक की दुनिया में चीन ने एक और बड़ी छलांग लगाई है। उसने थोरियम रिएक्टर से चलने वाले दुनिया के सबसे बड़े कार्गो जहाज को पेश कर वैश्विक स्तर पर सनसनी फैला दी है। रिपोर्टों के अनुसार यह जहाज थोरियम आधारित मोल्टन साल्ट रिएक्टर से चलता है, जो 200 मेगावाट बिजली पैदा करता है। इसकी क्षमता अमेरिकी नौसेना की अत्याधुनिक सीवुल्फ क्लास न्यूक्लियर पनडुब्बी के S6W रिएक्टर जितनी बताई जा रही है। यह जहाज 14,000 स्टैंडर्ड शिपिंग कंटेनर एक साथ ले जाने में सक्षम है, जो इसे अब तक का सबसे बड़ा और ऊर्जा-कुशल कार्गो शिप बनाता है।

थोरियम रिएक्टर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे कूलिंग के लिए पानी की आवश्यकता नहीं होती और यह पारंपरिक यूरेनियम रिएक्टरों की तुलना में अधिक सुरक्षित, कॉम्पैक्ट और पर्यावरण-अनुकूल है। इस रिएक्टर से उत्पन्न 200 मेगावाट ऊर्जा सीधे जहाज को नहीं चलाती, बल्कि सुपरक्रिटिकल कार्बन डाइऑक्साइड जनरेटर को शक्ति देती है, जो Brayton cycle के ज़रिए बिजली उत्पन्न करता है। इससे रेडिएशन का खतरा भी बेहद कम हो जाता है।
चीन में थोरियम के विशाल भंडार हैं—सिर्फ इनर मंगोलिया की एक खान में इतना थोरियम मौजूद है कि वह 1,000 वर्षों तक देश की मौजूदा बिजली जरूरत पूरी कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह सफलता वाणिज्यिक जहाजरानी और नौसेना इंजीनियरिंग के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।
वहीं, भारत दुनिया के लगभग 25% थोरियम भंडार के बावजूद अभी तीसरे चरण के न्यूक्लियर प्रोग्राम तक नहीं पहुंच पाया है, जिसमें थोरियम का ईंधन के रूप में प्रयोग होना है। भारत केरल, तमिलनाडु और ओडिशा की मोनाजाइट बालू में पाए जाने वाले थोरियम संसाधनों पर दशकों से शोध कर रहा है, लेकिन चीन की तेज प्रगति अब भारत के लिए चेतावनी की घंटी साबित हो रही है।

