नई दिल्ली, 25 नवम्बर (अशोक “अश्क”) विवाह पंचमी के पावन अवसर पर राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वज का प्रतिष्ठापन बुधवार को संत समाज के लिए अत्यंत भावपूर्ण और ऐतिहासिक क्षण बन गया। लगभग 500 वर्षों की प्रतीक्षा, संघर्ष और तपस्या के बाद प्रभु श्रीराम के दिव्य धाम पर धर्मध्वजा का आरोहण केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि सनातन आस्था की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक बताया जा रहा है। अवधपुरी के संत इस क्षण को सनातन समाज के आत्मगौरव और त्यागपूर्ण यात्रा का सार मानते हैं।

साधु-संतों का कहना है कि आज वह स्वप्न साकार हुआ है, जिसकी कल्पना उनके पूर्वजों ने सदियों पहले की थी। धर्मध्वजा का आरोहण न केवल भारतवर्ष की आध्यात्मिक विरासत को सुदृढ़ करता है, बल्कि विश्व मंच पर सनातन संस्कृति की महिमा को भी नई ऊंचाई प्रदान करता है।
संत समाज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका को इस उपलब्धि का आधार बताते हुए कहा कि डबल इंजन सरकार ने सनातन परंपराओं के संरक्षण और मंदिर संस्कृति के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। धार्मिक स्थलों पर सुविधाओं के विस्तार और संतों के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण को नई दिशा मिली है। राम वैदेही मंदिर के प्रतिष्ठित संत दिलीप दास ने कहा कि अयोध्या मिशन के माध्यम से सनातन संस्कृति का जिस प्रकार उत्थान हुआ, वह अत्यंत प्रशंसनीय है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी को “धर्म परंपरा की रक्षा के प्रहरी” बताया।
समारोह में संतों द्वारा प्रभु श्रीराम और माता जानकी के विवाह पर्व का पूजन-अर्चन भी संपन्न हुआ। संत समाज का विश्वास है कि धर्मध्वज का यह आरोहण भारत के उज्ज्वल भविष्य की आस्था को और दृढ़ करेगा तथा सनातन समाज के आत्मगौरव का शंखनाद सिद्ध होगा।

