पटना, 17 नवम्बर (पटना डेस्क) बिहार की सियासत में दशकों से सबसे प्रभावशाली माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव के परिवार के भीतर गहराते मतभेद एक बार फिर सुर्खियों में हैं। हाल ही में बेटी रोहिणी आचार्य द्वारा परिवार से नाता तोड़ने की घोषणा ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह पहली बार हुआ है? जवाब है नहीं। लालू परिवार में विवाद और दरार की शुरुआत 1990 के दशक से होती है, जब लालू सत्ता के शीर्ष पर थे और 1997 में राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके भाई साधु यादव और सुभाष यादव अत्यधिक प्रभावशाली हो गए थे।

पार्टी में अपनी भूमिका कम होते देख साधु यादव धीरे-धीरे असंतुष्ट हो गए। 2005 में सत्ता हाथ से निकलने पर उन्होंने राजद नेतृत्व की खुली आलोचना की और आरोप लगाया कि पार्टी “लालू परिवार की निजी दुकान” बन चुकी है। राबड़ी देवी ने भी साधु को परिवार विरोधी बताया, जिसके बाद रिश्ते हमेशा के लिए बिगड़ गए। दूसरी ओर, सुभाष यादव भी खुद को उत्तराधिकारी की दौड़ से बाहर महसूस करते रहे और लालू-राबड़ी के निर्णयों से असहमत होने लगे। धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई और अंततः सुभाष ने सक्रिय राजनीति से किनारा कर लिया।
2018 में तेज प्रताप यादव और ऐश्वर्या राय की शादी ने भी परिवार को भारी राजनीतिक और व्यक्तिगत नुकसान पहुंचाया। तलाक की प्रक्रिया के दौरान आरोप-प्रत्यारोप बढ़े और समधी चंद्रिका राय ने आरजेडी छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया। उन्होंने एनडीए के लिए प्रचार किया और 2024-25 में रोहिणी आचार्य के प्रतिद्वंद्वी राजीव प्रताप रूडी का साथ दिया, जिससे विवाद खुला सियासी टकराव बन गया।
परिवार की यह टूटन मई 2025 में निर्णायक मोड़ पर पहुंची, जब एक निजी तस्वीर वायरल होने के बाद तेज प्रताप को लालू यादव ने छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। तेज प्रताप ने इसे “जयचंदों के दबाव” का परिणाम बताते हुए कड़ा विरोध किया और 26 सितंबर 2025 को अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल (JJD) का गठन कर दिया। यह पहला अवसर था जब लालू के किसी पुत्र को सार्वजनिक रूप से अलग किया गया।

