पटना, 21 नवम्बर (पटना डेस्क) बिहार में मंगलवार को एक बार फिर सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक हलचल तेज हो गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड 10वीं बार पद और गोपनीयता की शपथ ली। उनके साथ 26 मंत्रियों ने भी शपथ ली। हालांकि, नई कैबिनेट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा परिवारवाद की हो रही है। बिहार की राजनीति में यह कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन इस बार हालत यह है कि 26 में से 10 मंत्री सीधे तौर पर राजनीतिक परिवारों से आते हैं। दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों ही सार्वजनिक मंचों पर परिवारवाद की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन नई टीम में परिवारवाद की पकड़ और मजबूत दिखाई देती है।

सबसे पहले बात डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की। तारापुर से विधायक सम्राट चौधरी राजनीतिक विरासत के धनी हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी कई बार विधायक रहे और मंत्री भी बने। मां पार्वती देवी भी विधायक रह चुकी हैं। इसके बाद आते हैं मंत्री नितिन नवीन, जिनके पिता नवीन किशोर प्रसाद पटना पश्चिम से चार बार बीजेपी विधायक रहे। पिता की राजनीतिक हैसियत ने ही नितिन नवीन का रास्ता आसान किया।
इसी तरह मंत्री अशोक चौधरी भी विरासत के वारिस हैं। उनके पिता महावीर चौधरी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मंत्री रह चुके थे। अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी भी सांसद हैं। खेल से राजनीति में आईं श्रेयसी सिंह के पिता दिग्विजय सिंह केंद्र की राजनीति में बड़ा नाम थे। पिता के निधन के बाद परिवार की विरासत संभालना बेटी ने ही जारी रखा।
HAM कोटे से मंत्री संतोष कुमार सुमन, पूर्व सीएम जीतन राम मांझी के पुत्र हैं। वहीं RLM कोटे से बने मंत्री दीपक प्रकाश उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं, जिन्हें बिना चुनाव लड़े मंत्री पद मिल गया।
JDU के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी भी राजनीतिक विरासत के धनी हैं। उनके पिता जगदीश प्रसाद तीन बार विधायक रहे थे। लेशी सिंह, जिन्होंने 2000 में पति बूटन सिंह की हत्या के बाद राजनीति में कदम रखा, आज नीतीश की कैबिनेट का अहम चेहरा हैं।
बीजेपी कोटे से आईं रमा निषाद भी राजनीतिक परिवार से हैं। उनके पति अजय निषाद और ससुर कैप्टन जय नारायण निषाद दोनों सांसद रह चुके हैं। अंत में JDU मंत्री सुनील कुमार, जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति चुनी, उनके पिता चंद्रिका राम भी बिहार सरकार में मंत्री रह चुके थे।
नीतीश की नई टीम भले ही प्रशासनिक दृष्टि से मजबूत मानी जा रही हो, लेकिन परिवारवाद की बढ़ती हिस्सेदारी ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है।

