पटना, 4 सितम्बर (अशोक “अश्क”) इस वर्ष पितृपक्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर तक रहेगा। सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों की आत्मा की शांति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। इन 15 दिनों में श्राद्ध और पिंडदान के माध्यम से अपने पितरों को स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। मान्यता है कि इस दौरान पितृलोक से पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देकर लौटते हैं।

इसी भावना से जुड़ी एक पवित्र परंपरा इस्लाम धर्म में भी है, जिसे शब-ए-बारात कहा जाता है। यह रात शाबान महीने की 15वीं रात को मनाई जाती है और इसे मगफिरत यानी माफी की रात कहा जाता है। ‘शब’ का अर्थ है रात और ‘बारात’ का अर्थ है छुटकारा या माफी, यानी यह वह रात है जब अल्लाह अपने बंदों को गुनाहों से माफ कर देते हैं।
इस्लामी मान्यता के अनुसार, इस रात पैगंबर हजरत मोहम्मद ने मदीना के कब्रिस्तान जन्नतुल बकी में अपने उम्मत और पूर्वजों के लिए दुआ की थी। इसीलिए मुस्लिम समुदाय के लोग इस रात को इबादत, दुआ और तौबा में बिताते हैं।
शब-ए-बारात पर प्रमुख रूप से की जाने वाली इबादतें:
- नफ्ल नमाजें: विशेष रूप से सलात-उत-तौबा और सलात-उत-तस्बीह पढ़ी जाती हैं।
- कुरान शरीफ की तिलावत: अल्लाह के कलाम की पढ़ाई से बरकत और रहमत मिलती है।
- दुआ और तौबा: सच्चे दिल से माफी मांगने और नेकी की राह पर चलने की नीयत की जाती है।
- तहज्जुद की नमाज: रात के अंतिम हिस्से में पढ़ी जाने वाली नमाज जो बेहद फजीलत वाली मानी जाती है।
- खैरात और नेक काम: गरीबों को दान देना और जरूरतमंदों की मदद करना इस रात के सवाब को बढ़ा देता है।
हालांकि कुरान में शब-ए-बारात का स्पष्ट जिक्र नहीं है, लेकिन हदीसों के अनुसार यह रात बहुत अहम मानी गई है। यह दोनों परंपराएं पितृपक्ष और शब-ए-बारात, इंसान को अपने पूर्वजों को याद कर श्रद्धा, दया और आत्मिक शुद्धि की प्रेरणा देती है।

