नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही सात वर्षों में पहली बार चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब भारत और चीन के बीच बीते वर्षों में सीमा विवाद, व्यापारिक प्रतिबंधों और राजनीतिक तनावों के चलते रिश्तों में खटास आई है। मोदी की इस यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों में सुधार की उम्मीद की जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि चीन खासकर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर जल्दबाजी के मूड में नहीं है।

पिछले कुछ समय में कई भारतीय कंपनियों ने चीनी तकनीक और निवेश की मदद से अपने प्रोजेक्ट्स की योजनाएं बनाई हैं, लेकिन चीन की ओर से मंजूरी में देरी हो रही है। उदाहरण के लिए, चीन की होम अप्लायंसेज निर्माता कंपनी हायर भारत में अपनी यूनिट की 48-50% हिस्सेदारी बेचने की योजना बना रही है। भारती ग्रुप के चेयरमैन सुनील मित्तल ने इस हिस्सेदारी को खरीदने के लिए समझौता भी किया है, लेकिन चीनी सरकार अब तक इस डील को लेकर स्पष्ट मंजूरी नहीं दे रही है।
इसी तरह PG Electroplast नामक भारतीय कंपनी एयर कंडीशनर के लिए कंप्रेसर बनाना चाहती है। इसके लिए वह चीन की प्रमुख कंप्रेसर निर्माता हाईली ग्रुप के साथ साझेदारी की तैयारी में है। हालांकि, कंपनी के एमडी विशाल गुप्ता ने बताया कि चीन की ओर से मंजूरी अभी लंबित है, जिससे उनका प्रोजेक्ट विलंबित हो सकता है। पहले यह प्रोजेक्ट वित्त वर्ष 2026 में शुरू होने वाला था, अब इसे एक साल आगे बढ़ाया जा सकता है।
जानकारों का कहना है कि चीन इलेक्ट्रिक वाहन और उन्नत कंपोनेंट्स जैसी टेक्नोलॉजी को लेकर बेहद सतर्क है। वह नहीं चाहता कि उसकी प्रमुख तकनीकें विदेशी कंपनियों के हाथ लगें। उद्योग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, चीन की सरकार ने कंपनियों को मौखिक रूप से निर्देश दिए हैं कि वे किसी भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर डील से पहले पूरी तरह जांच-पड़ताल करें।
चीन की इस नीति से भारत की कई कंपनियों की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं। जैसे कि सोना कॉमस्टार, डिक्सन टेक्नोलॉजीज, ईपैक ड्यूरेबल लिमिटेड, भगवती प्रोडक्ट्स जैसी कंपनियां चीनी फर्मों के साथ जॉइंट वेंचर की तैयारी में हैं। लुमैक्स ऑटो टेक तो चीन में इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी डिवेलपमेंट हब खोलने की योजना पर विचार कर रही है, ताकि नई तकनीकों तक पहुंच बनाई जा सके।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन पर लगाए गए टैरिफ के बाद चीन की वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर दबाव बढ़ा है। भारत और चीन अब एक संभावित व्यापार पैकेज पर चर्चा कर सकते हैं जिसमें रेयर अर्थ मैग्नेट्स, फर्टिलाइजर्स और फार्मास्यूटिकल्स के लिए कच्चे माल की आपूर्ति को फिर से बहाल करने पर फोकस होगा।
भारत ने 2020 में प्रेस नोट 3 लागू किया था, जिसके तहत भारत की सीमा से लगे देशों से होने वाले निवेश के लिए कई मंत्रालयों से मंजूरी लेना अनिवार्य है। यह नीति चीन की कंपनियों के भारत में निवेश को प्रभावित कर रही है। अब चीन ने भी वैसी ही रणनीति अपनाई है, जहां वह अपने टेक्नोलॉजी एग्रीमेंट्स पर नियंत्रण रखने के लिए जांच और देरी का सहारा ले रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित चीन यात्रा निश्चित रूप से एक कूटनीतिक प्रयास है जिससे द्विपक्षीय संबंधों को एक नई दिशा मिल सकती है। हालांकि, तकनीकी साझेदारी और निवेश को लेकर चीन की सतर्कता भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनौती बनी हुई है। भारत की कई कंपनियां चीन पर टेक्नोलॉजी और कंपोनेंट्स के लिए निर्भर हैं, ऐसे में दोनों देशों को विश्वास की नई नींव रखनी होगी। यह यात्रा उस दिशा में पहला लेकिन अहम कदम साबित हो सकता है।

