प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी पर पद से हटाने संबंधी विधेयक JPC को भेजा गया, दो-तिहाई बहुमत सबसे बड़ी चुनौती

नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) लोकसभा ने बुधवार को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी भी मंत्री की गंभीर अपराध में गिरफ्तारी और 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहने की स्थिति में उन्हें पद से हटाने संबंधी 130वें संविधान संशोधन विधेयक को विपक्ष के भारी विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया। इसके साथ दो अन्य विधेयकों को भी समिति को सौंपा गया है।

विधेयक का उद्देश्य उच्च पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। लेकिन इस विधेयक को पारित कराने के रास्ते में तीन बड़ी संवैधानिक और राजनीतिक अड़चनें हैं। सबसे पहली और अहम अड़चन है दोनों सदनों में विशेष बहुमत।
संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों – लोकसभा और राज्यसभा में दो चरणों में बहुमत से पारित होना होता है। पहला, सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और दूसरा, उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।
लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 542 है, जिसमें साधारण बहुमत के लिए 272 सांसदों की आवश्यकता होती है। वर्तमान में एनडीए के पास 293 सांसद हैं, इसलिए यह बाधा सरकार पार कर सकती है। राज्यसभा में कुल 239 सदस्य हैं और साधारण बहुमत के लिए 120 सांसदों की जरूरत है, जहां एनडीए के पास 132 सांसद हैं।
हालांकि असली चुनौती दो-तिहाई बहुमत है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 सांसदों की जरूरत है, जबकि एनडीए के पास सिर्फ 293 हैं। यानी 69 सांसदों का समर्थन और चाहिए। राज्यसभा में यह आंकड़ा 160 का है, जबकि एनडीए के पास 132 सांसद हैं। यहां 28 और सांसदों की आवश्यकता है।
सरकार यदि बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस और कुछ निर्दलीय सांसदों का समर्थन भी हासिल कर ले, तब भी दो-तिहाई बहुमत जुटा पाना आसान नहीं होगा।
विपक्षी दलों ने इस विधेयक को ‘काला कानून’ बताया है और कहा है कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए किया जा सकता है। INDIA गठबंधन ने विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए संसद में इसका जबर्दस्त विरोध किया।
JPC अब इस विधेयक की समीक्षा करेगी। उम्मीद की जा रही है कि संसद के शीतकालीन सत्र से पहले समिति अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। यदि JPC में विपक्षी सदस्य शामिल होते हैं और सरकार उनके सुझावों को मानने के लिए तैयार होती है। जैसे कि केवल दोष सिद्ध होने पर ही पद छोड़ने का प्रावधान तो विपक्षी समर्थन की संभावना बन सकती है।
इस विधेयक को पारित कराने की तीसरी शर्त है कि इसे आधे से अधिक राज्य विधानसभाओं से भी पारित कराया जाए। चूंकि देश के अधिकांश राज्यों में एनडीए या उसके सहयोगियों की सरकारें हैं, इसलिए यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान मानी जा रही है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर सांसद या विधायक की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। नया विधेयक इससे पहले ही, यानी सिर्फ गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत के आधार पर, मंत्री को पद से हटाने की बात करता है।
यदि JPC की रिपोर्ट में संतुलित सुझाव आते हैं और सरकार विपक्ष को भरोसे में लेने में सफल होती है, तो यह ऐतिहासिक संशोधन पारित हो सकता है। अन्यथा, संसद में दो-तिहाई बहुमत की कमी इस रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आएगी।

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