नई दिल्ली, 1 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) पाकिस्तान की संसद में उस वक्त सनसनी फैल गई जब सीनेटर कामरान मुर्तजा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के बड़े हिस्सों पर अब सरकार और सेना का नियंत्रण नहीं रह गया है। संसद में दिए अपने बयान में मुर्तजा ने कहा कि इन दोनों प्रांतों में कई इलाके पूरी तरह विद्रोही संगठनों के कब्जे में हैं और सुरक्षा बल असहाय साबित हो रहे हैं।

सीनेटर कामरान मुर्तजा ने सवाल उठाया, “क्या सच में बलूचिस्तान में पाकिस्तान का शासन रह गया है?” उन्होंने खुलासा किया कि बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में भी सेना का प्रभाव सिर्फ पांच किलोमीटर के दायरे में सीमित रह गया है। उन्होंने बताया कि किसी भी मंत्री या सांसद की सड़क मार्ग से यात्रा मुमकिन नहीं है, क्योंकि विद्रोही लड़ाकों ने अहम मार्गों पर कब्जा कर रखा है।
कामरान के इस बयान के बाद बलूच नेताओं और विद्रोही गुटों ने इसे अपनी “राजनीतिक और सैन्य जीत” के रूप में पेश किया है। बलूचिस्तान में सक्रिय बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) समेत कई संगठनों ने दशकों से पाकिस्तानी सेना और सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ा हुआ है। वे स्थानीय लोगों को अधिक अधिकार और संसाधनों पर नियंत्रण देने की मांग कर रहे हैं।
हाल ही में बीएलए ने दावा किया कि उसने बलूचिस्तान के जेहरी क्षेत्र में पाकिस्तान सेना के 15 सैनिकों की हत्या की है। संगठन ने यह भी कहा कि अगस्त से यह इलाका स्वतंत्रता समर्थक गुटों के कब्जे में है और सेना इसे वापस लेने में विफल रही है।
इसी तरह, खैबर पख्तूनख्वा में भी हालात चिंताजनक हैं। कुछ महीने पहले लक्की मरवत क्षेत्र के स्थानीय नेता शेर अफजल मरवत ने स्पष्ट किया था कि उनके इलाके के बड़े हिस्से पर तालिबान का कब्जा है।
बलूचिस्तान में लंबे समय से अस्थिरता बनी हुई है। सेना द्वारा बार-बार सैन्य अभियानों के बावजूद विद्रोह शांत नहीं हो सका है। संसद में आए इस तरह के बयानों से साफ है कि पाकिस्तान के भीतरी संकट अब सतह पर आ चुके हैं। सवाल उठता है कि क्या इस बार सरकार और सेना इन इलाकों को फिर से अपने नियंत्रण में ले पाएगी या देश में और गहराती राजनीतिक व सामाजिक अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा।

