
पटना, 15 जनवरी (पटना डेस्क) बिहार विधानसभा के भीतर इन दिनों सबसे ज्यादा भरोसेमंद स्थिति वामदलों के विधायकों की मानी जा रही है। संख्या भले कम है, लेकिन उनके भटकने या पलटने की आशंका नहीं के बराबर है। इसके उलट खरमास के दौरान सियासी गलियारों में असंतोष, टूट और जोड़-तोड़ की चर्चाएं तेज हैं। कभी राष्ट्रीय जनता दल जनता दल यूनाइटेड के विधायकों में असंतोष का दावा करता है, तो कभी सत्ताधारी दल राजद-कांग्रेस के विधायकों के टूटने की गारंटी देने लगते हैं।राजद के पास 25 विधायक हैं, इसलिए दल-बदल कानून के तहत उसके 17 विधायकों के टूटने की चर्चा फिलहाल ठंडी है।

असली नजर कांग्रेस पर है। बिहार विधानसभा में कांग्रेस के सिर्फ छह विधायक हैं और हर राजनीतिक बैठक, दही-चूड़ा पार्टी से लेकर बंद कमरे की मीटिंग तक, इन्हीं छह पर चर्चा है।पिछले चुनाव में कांग्रेस के 19 विधायक चुने गए थे, जिनमें से दो 2024 में टूटकर सत्ता पक्ष में चले गए थे और तब नियमों की व्याख्या सत्ताधारी पक्ष के अनुकूल रही। अब दल-बदल कानून के अनुसार कांग्रेस के विधायकी बचाने के लिए छह में से कम से कम चार विधायकों का एक साथ टूटना जरूरी है।

इससे कम संख्या होने पर उपचुनाव तय है।एनडीए के भीतर चर्चा है कि कांग्रेस के पांच विधायकों पर नजर है, लेकिन चार की गारंटी हुए बिना कोई सौदा फाइनल नहीं माना जा रहा। ऐसे में बिहार की सियासत एक बार फिर करवट लेने को तैयार दिख रही है।

