पटना, 15 नवंबर (पटना डेस्क) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मतदाताओं ने जाति-आधारित राजनीति की पारंपरिक धारणाओं को तोड़ते हुए एकतरफा मतदान किया और नीतीश कुमार की सरकार की वापसी कराई। लंबे समय से कहा जाता था कि बिहार में चुनाव जाति के आधार पर ही तय होते हैं, लेकिन इस बार के परिणामों ने इन धारणाओं को चुनौती दी है। खासकर RJD के कोर वोटर माने जाने वाले यादव और मुस्लिम समुदाय ने पार्टी से दूरी बना ली, जिसका असर उसके प्रदर्शन पर स्पष्ट दिखा।

महागठबंधन ने 66 यादव उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से केवल 12 ही जीत सके। वहीं मुस्लिम उम्मीदवारों में राजद के तीन, कांग्रेस के दो, जदयू के एक और AIMIM के पांच प्रत्याशी विजयी हुए। यह पहली बार है जब मुस्लिम सियासत में AIMIM ओवैसी की पार्टी नया विकल्प बनकर उभरी है।
इस चुनाव में सबसे अधिक विधायक राजपूत समुदाय से चुने गए—कुल 32। यादव विधायक घटकर 28 रह गए, जबकि कुर्मी से 25 और कुशवाहा से 23 विधायक बने। वैश्य समुदाय के 26, भूमिहार के 23, ब्राह्मण के 14 और कायस्थ के 3 विधायक विधानसभा पहुंचे। पिछड़े वर्ग से 13, दलित समुदाय से 36 और एसटी समुदाय से 11 उम्मीदवार विजयी हुए। मुस्लिम प्रतिनिधित्व केवल 10 पर सिमट गया।
पिछले दो चुनावों से तुलना करें तो बदलाव स्पष्ट है। 2020 में यादव समुदाय के 55 विधायक थे, जबकि 2015 में यह संख्या 61 थी। मुस्लिम विधायक 2020 में 14 और 2015 में 24 थे, जबकि इस बार मात्र 10 चुने गए। आंकड़े बताते हैं कि 2025 में बिहार विधानसभा जातीय दबदबे की पुरानी संरचना से बाहर निकलकर अधिक विविध स्वरूप में सामने आई है।

