गोपालगंज, 2 सितम्बर (अशोक “अश्क”) गोपालगंज जिले का भोरे विधानसभा क्षेत्र बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक और रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है। महाभारतकालीन योद्धा भूरिश्रवा की धरती कहे जाने वाले इस क्षेत्र का नाम भी कथित रूप से उन्हीं के नाम पर पड़ा है। यह गोपालगंज का एकमात्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है, जिसका राजनीतिक इतिहास जितना समृद्ध है, उतनी ही दिलचस्प इसकी वर्तमान सियासी तस्वीर है।

भोरे से वर्तमान विधायक और बिहार के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। उन्होंने 2020 में जदयू से चुनाव लड़ते हुए CPI (ML) के जितेंद्र पासवान को मात्र 462 वोटों से हराया था। सुनील कुमार के पिता चंद्रिका राम भी इस सीट से पहले विधायक और बिहार सरकार में कृषि मंत्री रह चुके हैं। सुनील कुमार के भाई अनिल कुमार भी तीन बार यहां से विधायक रह चुके हैं।
सुनील कुमार का दावा है कि उन्होंने वादे नहीं किए थे, लेकिन पांच वर्षों में 1200 करोड़ रुपये की विकास योजनाएं शुरू कीं। प्रमुख परियोजनाओं में बीपीएस कॉलेज में साइंस की पढ़ाई की शुरुआत, कटैया बायपास का निर्माण, छह नए पुल, बैरिया में सुधा डेयरी प्लांट और 32 एकड़ में औद्योगिक क्षेत्र शामिल हैं।
इसके अलावा, क्षेत्र में स्वास्थ्य केंद्रों, नलजल योजना, कूड़ा उठाव योजना, सड़क चौड़ीकरण और बंद पड़ी नहर परियोजनाओं को फिर से शुरू करने जैसे कई प्रयास किए गए हैं।
सीपीआई (माले) के संभावित उम्मीदवार जितेंद्र पासवान आरोप लगाते हैं कि सुनील कुमार के कार्यकाल में घोषणाएं तो हुईं, लेकिन जमीनी काम अधूरे हैं। नहरों में पानी नहीं, ट्यूबवेल खराब, महिला कॉलेज नहीं बना, डेयरी प्लांट बंद पड़ा है। साथ ही, गरीबों को वादा करने के बावजूद आर्थिक मदद नहीं मिली और सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार चरम पर है।
भोरे का भूगोल और जनसंख्या विविध है। 623 वर्ग किमी में फैले इस क्षेत्र में करीब 3.7 लाख मतदाता हैं, जिनमें 14.27% अनुसूचित जाति और लगभग 11% मुस्लिम वोटर हैं। कोइरी, राजपूत, ब्राह्मण, रविदास आदि जातियों का भी खासा प्रभाव है।
2025 का चुनाव भोरे के लिए महज सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि विकास की सच्चाई और वादों की हकीकत का परीक्षण होगा। एक ओर मंत्री का ट्रैक रिकॉर्ड है, तो दूसरी ओर विपक्ष का सवाल “विकास सिर्फ कागज़ पर या ज़मीन पर?”

