
बक्सर, 01 मार्च (विक्रांत) बिहार में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनोखी और प्रेरक पहल सामने आई है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर ने मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले अस्थायी पुष्प अपशिष्ट से प्राकृतिक और त्वचा-अनुकूल गुलाल का सफल उत्पादन शुरू कर दिया है। यह अभिनव प्रयोग माननीय कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह के दूरदर्शी नेतृत्व में संचालित हो रहा है, जिसने श्रद्धा और सतत विकास को एक सूत्र में पिरो दिया है।

विश्वविद्यालय की यह पहल “गॉड टू गॉड” थीम पर आधारित है। यानी मंदिरों में अर्पित फूलों से तैयार गुलाल को पुनः मंदिरों को ही समर्पित किया जा रहा है। इस अनूठे प्रयास से आस्था, पर्यावरण संरक्षण और अपशिष्ट प्रबंधन का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है।यह प्राकृतिक गुलाल पूरी तरह रासायनिक रंगों से मुक्त है और त्वचा के लिए सुरक्षित पुष्पों से तैयार किया जाता है।

इसकी शेल्फ लाइफ तीन वर्षों तक बताई गई है। शुद्ध फूलों से निकाले गए आवश्यक तेलों के समावेशन के कारण यह गुलाल न केवल त्वचा के लिए लाभकारी है, बल्कि अरोमा थेरेपी के जरिए मन और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव भी डालता है। पुष्प विज्ञान एवं उद्यान सज्जा विभाग की डॉ. दीप्ति सिंह वर्ष 2023 से विश्वविद्यालय की फ्लावर प्रोसेसिंग प्रयोगशाला में गेंदा, बुल्गारियन गुलाब, मोगरा, अपराजिता, गुड़हल और पलाश जैसे सुगंधित पुष्पों से दस से अधिक रंगों में प्राकृतिक गुलाल तैयार कर रही हैं।

साथ ही इसकी आकर्षक और मानकीकृत पैकेजिंग पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि भविष्य में ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा मिल सके।यही नहीं, विश्वविद्यालय मंदिरों के पुष्प अपशिष्ट से ग्रीटिंग कार्ड, बुकमार्क, पेन स्टैंड, टेबल टॉप सजावट, वॉल क्विल्ट और कोस्टर सेट जैसे शुष्क पुष्प उत्पाद भी बना रहा है। यह पहल “कचरे से कंचन” की अवधारणा को साकार करते हुए हरित और आत्मनिर्भर बिहार की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।

