मुरादाबाद (अशोक “अश्क”) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद उदित राज एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं। इस बार उन्होंने मुसलमानों को पहचान छिपाने की सलाह दी है, जिससे राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर उदित राज ने लिखा कि उत्तर प्रदेश समेत कई जगहों पर मुसलमानों को अपनी पहचान छिपाकर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है, और ऐसे में वे दलितों से बातचीत कर उनके नाम और जातियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

उदित राज ने मुरादाबाद के बैंडबाजा कारोबारियों का हवाला देते हुए लिखा, “मुरादाबाद में मुस्लिम बैंडबाजा वालों को हिंदू नाम रखना मजबूरी हो गया है, क्योंकि इनका बहिष्कार आम बात हो गई है। नफरत इतनी है कि बहुसंख्यक समाज इनसे सेवा नहीं लेना चाहता।” उन्होंने इसे सामाजिक भेदभाव का गंभीर उदाहरण बताते हुए कहा कि यह सिलसिला सिर्फ मुस्लिमों तक सीमित नहीं है, बल्कि दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को भी अपनी जाति छिपाकर कारोबार करना पड़ता है।
उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा, “क्या आज भी चमार, कोली, खटिक, मातंग, वाल्मीकि, पासी अपनी जाति के नाम से मिष्ठान या खाद्य वस्तुओं की दुकान खोल सकते हैं? नहीं, क्योंकि समाज का रवैया अब भी भेदभावपूर्ण है।”
पूर्व भाजपा सांसद रहे उदित राज ने कहा कि मुसलमानों और दलितों के बीच संवाद और सहयोग की जरूरत है। उन्होंने लिखा, “जब अपने धर्म के लोगों के साथ इतना भेदभाव होता है, तो मुसलमानों के साथ होना कोई बड़ी बात नहीं। मुसलमानों की हालत बहुत खराब है और अगर परिस्थिति ऐसी हो कि उन्हें गैर मुस्लिम नाम रखना पड़े, तो वे दलित और पिछड़े वर्ग से संवाद करें। कई लोग ऐसे होंगे जो अपनी जाति और नाम देने को तैयार होंगे।”
उदित राज के इस बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोगों ने इसे सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ावा देने की कोशिश बताया, तो कईयों ने इसे समाज में और अधिक भ्रम और विभाजन पैदा करने वाला बयान करार दिया।
बहरहाल, यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में सामाजिक समरसता और समानता को लेकर बहस तेज है। उदित राज के इस सुझाव ने एक बार फिर इस मुद्दे को केंद्र में ला दिया है कि आखिर समाज में पहचान के आधार पर भेदभाव कब खत्म होगा।

