नई दिल्ली, 4 सितम्बर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष बुधवार को कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश ने राज्यपाल की विधायी भूमिका पर केंद्र सरकार के रुख का कड़ा विरोध किया। विपक्ष शासित इन राज्यों ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्यपाल का कानून निर्माण में कोई अधिकार नहीं है, और वह केवल नाममात्र के प्रमुख होते हैं।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने कर्नाटक सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने दलील दी कि राज्यपाल के पास कार्यकारी शक्ति है, लेकिन विधायी शक्ति नहीं। उन्होंने केंद्र की इस बात को खारिज किया कि राज्यपाल को विधेयक को मंजूरी देने या रोकने का विवेकाधिकार प्राप्त है। उन्होंने कहा, “1954 से यह स्पष्ट स्थिति है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं।”

पश्चिम बंगाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी इसी तर्ज पर तर्क दिया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक की विधायी वैधता की जांच नहीं कर सकते, यह काम केवल अदालतों का है। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी कानून नागरिक या अन्य पक्ष द्वारा अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन राज्यपाल इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
हिमाचल प्रदेश की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद शर्मा ने पीठ को बताया कि संसद या राज्य विधानसभा को बुलाने के लिए भी राष्ट्रपति या राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं। उन्होंने कहा कि जब वे सदन में आते हैं, तो सिर्फ संबोधन करते हैं, अध्यक्षता नहीं।
इस दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि राज्यपाल को यह देखने के लिए विवेक इस्तेमाल करने की आवश्यकता हो सकती है कि क्या विधेयक विरोधाभासी है या नहीं। इस पर बंगाल सरकार ने जवाब दिया कि राज्य विधानसभा की संप्रभुता, संसद की तरह ही महत्वपूर्ण है।
संविधान पीठ इस पूरे मुद्दे पर राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ पर सुनवाई कर रही है, जो वर्तमान में राजनीतिक और संवैधानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बन चुका है।

