राज्यपाल को नहीं है विधेयक रोकने का अधिकार: विपक्ष शासित राज्यों की सुप्रीम कोर्ट में दलील

नई दिल्ली, 10 सितम्बर (अशोक “अश्क”) केंद्र और राज्यों के अधिकारों की व्याख्या से जुड़ी एक अहम सुनवाई के दौरान कर्नाटक, पंजाब, केरल और तेलंगाना जैसे विपक्ष शासित राज्यों ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में जोरदार दलीलें दीं। इन राज्यों ने कहा कि संविधान राष्ट्रपति और राज्यपाल को यह विवेकाधिकार नहीं देता कि वे किसी विधेयक को रोक सकें, चाहे वह असंवैधानिक हो या किसी केंद्रीय कानून से टकराता हो।


कर्नाटक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा, “राज्यपाल को व्यापक विवेकाधिकार देना दोहरी सत्ता की स्थिति पैदा करेगा। उन्हें या राष्ट्रपति को किसी विधेयक पर वीटो का अधिकार नहीं है। वे केवल मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ विशेष मामलों में जैसे भ्रष्टाचार विरोधी मामलों में अभियोजन की अनुमति, विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में कार्य करना या धार्मिक संस्थानों के मुखिया की भूमिका में राज्यपाल स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं।
सुब्रमण्यम ने कहा कि किसी विधेयक पर राज्यपाल को असहमति जताने का अधिकार केवल एक बार पुनर्विचार के लिए विधायिका को लौटाने तक सीमित है। यदि विधानसभा उसे दोबारा पारित कर दे, तो उसे मंजूरी देना राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णयों के लिए एक समयसीमा निर्धारित होनी चाहिए, ताकि वे अनिश्चितकाल तक विधेयकों को लंबित न रख सकें।
पंजाबकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा, “राज्य विधानसभाएं ऐसे कानून बना सकती हैं जो पहली नजर में असंवैधानिक दिखें। लेकिन उनकी वैधता तय करने का अधिकार केवल संवैधानिक न्यायालयों को है, न कि राज्यपाल को।”
उन्होंने यह भी दोहराया कि राष्ट्रपति भी मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे होते हैं और वह किसी राज्य की जनता की इच्छा को खारिज करते हुए विधेयकों को लंबित नहीं रख सकते।
सुनवाई के दौरान जब डीएमके की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने बोलने की कोशिश की, तो मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि तमिलनाडु पहले ही इस मामले में विस्तार से अपनी बात रख चुका है और अन्य राजनीतिक दलों को यदि बोलने दिया गया, तो सुनवाई राजनीतिक रंग ले सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ वर्तमान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए 14 सवालों की जांच कर रही है। इनमें मुख्य सवाल यह है कि क्या राज्यपाल या राष्ट्रपति विधेयकों पर अनिश्चित काल तक फैसला टाल सकते हैं, और क्या कोर्ट उनके लिए समयसीमा तय कर सकता है।
मामले की सुनवाई संभवतः आज, 10 सितंबर को पूरी हो सकती है।

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