नई दिल्ली, 10 नवम्बर (अशोक “अश्क”) भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल सात प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रही है और वैश्विक निवेशक इसे आकर्षक निवेश गंतव्य के रूप में देख रहे हैं। लेकिन इन मजबूत आर्थिक संकेतकों के बीच विकास का असंतुलन गहराता जा रहा है। समावेशी विकास की धारा राज्यों की गलत प्राथमिकताओं के कारण कमजोर पड़ रही है। कई राज्य चुनावी लाभ के लिए संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग कर रहे हैं, जिससे पूंजीगत खर्च के लिए धन की भारी कमी हो रही है।

पंजाब ने 2024-25 में अपनी कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 76 प्रतिशत वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर खर्च किया, जबकि पूंजीगत खर्च मात्र 7,445 करोड़ रुपये रहा—जो वेतन और ब्याज के खर्च का दसवां हिस्सा भी नहीं है। हिमाचल प्रदेश ने अपने बजट का 60–65 प्रतिशत राजस्व खर्चों में लगाया और उसका पूंजीगत व्यय 6,270 करोड़ रुपये के आसपास रहा। बिहार की प्रति व्यक्ति आय मात्र ₹66,828 है, जो राष्ट्रीय औसत का एक तिहाई है। राज्यों में चुनाव नज़दीक आते ही मुफ्त बिजली, कर्ज माफी और नकद सहायता जैसी घोषणाएं बढ़ जाती हैं, जिससे वित्तीय अनुशासन बिगड़ता जा रहा है।
वर्तमान में पंजाब का कर्ज उसके जीएसडीपी के 46 प्रतिशत और हिमाचल प्रदेश का 44 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इन राज्यों में ब्याज भुगतान पूंजीगत निवेश से भी अधिक है। यही प्रवृत्ति पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी देखी जा रही है। विडंबना यह है कि जो राज्य समावेशी विकास की बात करते हैं, वही अपने भविष्य को उधार के पैसों से गिरवी रख रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वित्तीय प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो भारत के राज्यों का हाल लैटिन अमेरिकी देशों जैसा हो सकता है, जहां जनकल्याण के नाम पर अत्यधिक खर्च से विकास ठहर गया। इसलिए 16वें वित्त आयोग को पूंजीगत खर्च को विकेंद्रीकरण से जोड़ना चाहिए और राज्यों को केरल के केआईआईएफडी मॉडल जैसी दीर्घकालिक वित्तीय नीतियां अपनानी चाहिए। अन्यथा भारत की 7 प्रतिशत की विकास दर भी इस संघीय असंतुलन को छिपा नहीं पाएगी।

