समस्तीपुर, 3 सितम्बर (राजेश झा) बिहार में 225 से अधिक सम्बद्ध डिग्री महाविद्यालयों के शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारी सात वर्षों से वेतन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर पाई है। 2017 से वेतन न मिलने के कारण कई शिक्षकों की आर्थिक स्थिति बदहाल हो चुकी है, और कुछ ने आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लिया है।

वहीं, एक ओर सरकार पांच लाख नए शिक्षकों को नियुक्ति पत्र बांट रही है, दूसरी ओर पहले से कार्यरत हजारों अनुदानित कॉलेजों के शिक्षक अनदेखी के शिकार हो रहे हैं। यह विरोधाभास मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “सुशासन” पर सवाल खड़े करता है।
त्योहारी सीजन करीब है, लेकिन अब तक कोई भुगतान नहीं किया गया। शिक्षकों की मांग है कि कम से कम दुर्गापूजा से पहले अनुदान जारी हो, ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।
सूत्रों के मुताबिक, इन कॉलेजों में सत्ता पक्ष और विपक्ष से जुड़े नेताओं का सीधा हस्तक्षेप है। कई जगहों पर कॉलेज मालिक, अध्यक्ष या सचिव शिक्षकों को वेतन देना तो दूर, सम्मानजनक व्यवहार तक नहीं करते। विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी और कार्रवाई का अभाव भी गंभीर चिंता का विषय है।
सरकार की बेरुखी ने शिक्षकों को मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है। इलाज, बच्चों की पढ़ाई, दो वक्त की रोटी तक मुहाल है।
अगर नीतीश सरकार अब भी नहीं जागी, तो विधानसभा चुनाव 2025 में इसका खामियाजा भुगतना तय है। शिक्षकों के सब्र का बाँध अब टूटने को है। चुनावी वर्ष में यह मुद्दा सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

