नई दिल्ली, 13 सितंबर (अशोक “अश्क”) देशभर में अपने सपनों का घर पाने के लिए जीवनभर की कमाई लगाने वाले हजारों फ्लैट खरीदारों के दर्द को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से समझा है। शुक्रवार को सुनाए गए एक ऐतिहासिक फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि आवास का अधिकार केवल अनुबंध आधारित अधिकार नहीं, बल्कि यह भारतीय संविधान के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने साफ कहा कि घर का सपना अब जीवनभर का दुःस्वप्न नहीं बनना चाहिए।

कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ जस्टिस जेबी पार्डीवाला और आर महादेवन ने इस फैसले में फ्लैट खरीदारों के हितों की सुरक्षा, रियल एस्टेट सेक्टर में पारदर्शिता और सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर कई अहम निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने कहा, “मध्यम वर्ग का व्यक्ति घर खरीदने के लिए जीवनभर की कमाई खर्च करता है। वह ईएमआई भरता है, साथ ही किराया भी देता है। पैसा देने के बावजूद अगर उसे घर नहीं मिलता तो यह उसकी सेहत, गरिमा और मानसिक संतुलन पर बुरा असर डालता है।”
कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL) के तहत एक रिवाइवल फंड स्थापित करने पर विचार करे ताकि संकटग्रस्त रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को पुनर्जीवित किया जा सके। या फिर SWAMIH फंड का दायरा बढ़ाया जाए। हालांकि कोर्ट ने चेताया कि यह पब्लिक मनी है और इसका हर रुपया सख्ती से उसी उद्देश्य के लिए खर्च होना चाहिए। इसके लिए CAG द्वारा समय-समय पर ऑडिट और रिपोर्ट सार्वजनिक करने के निर्देश भी दिए गए।
कोर्ट ने कहा कि NCLT और NCLAT की सभी रिक्तियां युद्धस्तर पर भरी जाएं। जरूरत पड़ने पर सेवानिवृत्त जजों की तदर्थ नियुक्ति की जा सकती है। सरकार को तीन महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
तीन महीने में हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित होगी, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों, रियल एस्टेट, IBC, नीति आयोग, IIM और उद्योग जगत के विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह समिति रियल एस्टेट में सफाई और सुधारों के लिए सुझाव देगी।
राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया कि वे RERA अथॉरिटी में पर्याप्त स्टाफ, संसाधन और विशेषज्ञों की नियुक्ति सुनिश्चित करें। हर RERA में एक कानूनी विशेषज्ञ या कंज्यूमर एडवोकेट अनिवार्य होगा। कोई भी प्रोजेक्ट बिना गहन जांच के पास नहीं होगा। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इसमें चूक ऐसी गलती होगी जिसकी कानून में कोई माफी नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि IBC कार्यवाही में रियल एस्टेट दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर है, ऐसे में IBBI एक परिषद गठित करे जो विशेष दिशानिर्देश तैयार करे।
जो यूनिट तैयार है, वहां कब्जा लेने के इच्छुक आवंटी को कब्जा दिया जाए।
COC में खरीदारों का सार्थक प्रतिनिधित्व हो, जिसमें हितों का टकराव न हो।
जब धारा 7 के तहत अर्जी दाखिल हो तो देखा जाए कि आवेदनकर्ता वास्तविक खरीदार है या मुनाफाखोर निवेशक।
कोर्ट ने एक बड़ा निर्देश देते हुए कहा कि रियल एस्टेट के किसी भी नए प्रोजेक्ट में खरीदार को यदि संपत्ति की कीमत का कम से कम 20% भुगतान हो चुका हो, तो उसका स्थानीय राजस्व प्राधिकरण में पंजीकरण अनिवार्य होगा।
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के चार फैसलों पर सुनवाई करते हुए सुनाया है। इसमें दो अपीलकर्ताओं को मात्र निवेशक मानते हुए उनके दावे खारिज किए गए। कोर्ट ने वास्तविक खरीदार और मुनाफे के लिए निवेश करने वालों में फर्क को स्पष्ट किया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला रियल एस्टेट सेक्टर में न सिर्फ विश्वास बहाल करेगा, बल्कि हजारों खरीदारों के अधूरे सपनों को नई उम्मीद वासीभी देगा। यह एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय है जो केवल घर की बात नहीं करता, बल्कि पूरे सिस्टम को सुधारने की दिशा में एक ठोस कदम है।

