साहेबगंज सीट पर फिर गर्माने लगी सियासत, 2025 में बदले समीकरणों की होगी परीक्षा

मुजफ्फरपुर (अशोक “अश्क”) जिले की साहेबगंज विधानसभा सीट का राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व हमेशा खास रहा है। यहां का इतिहास जितना समृद्ध रहा है, उतनी ही इस क्षेत्र की सियासी जमीन भी उपजाऊ रही है। पूर्वी चंपारण के पास स्थित केसरिया बौद्ध स्तूप, महात्मा गांधी की चंपारण यात्रा और बदुरवा मठ जैसे ऐतिहासिक स्थलों से यह इलाका विशेष पहचान रखता है।


1952 में अस्तित्व में आई इस सीट पर 1985 तक कांग्रेस का दबदबा रहा। हालांकि, 1990 में मंडल राजनीति की लहर में बदलाव आया और जनता दल के टिकट पर राम विचार राय ने जीत दर्ज की। वे लगातार तीन बार विधायक बने और इस सीट पर दो दशक तक सियासत उन्हीं और राजू कुमार सिंह के इर्द-गिर्द घूमती रही।
वर्तमान में विधायक और पर्यटन मंत्री राजू कुमार सिंह राजनीति में कई दलों का सफर तय कर चुके हैं। 2005 में लोजपा से शुरूआत कर वे जदयू, वीआईपी होते हुए अब भाजपा में हैं। 2020 का चुनाव उन्होंने वीआईपी के टिकट पर लड़ा और जीते, लेकिन अब भाजपा से उनकी उम्मीदवारी संभावित मानी जा रही है।
राम विचार राय के निधन के बाद महागठबंधन की ओर से नए नेतृत्व की तलाश है। राजद जिलाध्यक्ष रमेश कुमार गुप्ता ने कहा है कि साहेबगंज सीट पर उनकी पार्टी की स्वाभाविक दावेदारी है और राजद ही उम्मीदवार तय करेगा।
इस बार का चुनाव बदले समीकरणों के साथ विकास और उपेक्षा के मुद्दों पर केंद्रित रहने वाला है। एनडीए की सरकार ने साहेबगंज में कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें हाजीपुर-सुगौली रेललाइन का साहेबगंज तक विस्तार, पारू के फतेहाबाद में गंडक नदी पर पुल की स्वीकृति और SH-74 को फोरलेन में बदलने का कार्य प्रमुख हैं। इसके अलावा साहेबगंज को नगर पंचायत से नगर परिषद में उत्क्रमित करना भी बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
पूर्व सहकारिता मंत्री नवल किशोर सिंह, जो यहां से तीन बार विधायक रह चुके हैं, को लोग आज भी सहकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए याद करते हैं।
हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि बुनियादी जरूरतों को लेकर अब भी क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। महिला डिग्री कॉलेज की स्थापना नहीं हो सकी है, सीएचसी में महिला चिकित्सक की तैनाती नहीं हो पाई है और देवरिया को प्रखंड बनाने की दशकों पुरानी मांग आज भी लंबित है। इसके अलावा, मत्स्यपालन के लिए तीन प्रमुख चौरों का विकास और बांध निर्माण से विस्थापित लोगों का पुनर्वास भी अधूरा है।
अब देखना यह है कि ऐतिहासिक, राजनीतिक और विकास के इन तमाम पहलुओं के बीच साहेबगंज की जनता किसे अपना नेता चुनती है। 2025 का चुनाव इस क्षेत्र की सियासी दिशा तय करेगा और यह भी बताएगा कि बदले समीकरणों के बीच कौन जनता की कसौटी पर खरा उतरता है।

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