नई दिल्ली, 18 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) हिंदी सिनेमा की चर्चित और प्रतिभाशाली अदाकारा स्मिता पाटिल को अपने करियर में अक्सर दो धाराओं मेनस्ट्रीम और मीनिंगफुल सिनेमा के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष करना पड़ा। उनकी यह जद्दोजहद सिर्फ किरदारों के चुनाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि इंडस्ट्री की रूढ़िवादी सोच और व्यावसायिक दबावों से भी लगातार टकराती रही।

एक पुराने इंटरव्यू में स्मिता ने स्वीकारा था कि शुरुआत में उन्हें लगा था कि कमर्शियल फिल्में करना मजेदार होगा, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि इन फिल्मों में महिलाएं सिर्फ एक सांचे में ढलती हैं। उन्होंने कहा था, “अगर मुझे बार-बार कमर्शियल फिल्मों में धकेला गया, तो वही मेरा अंत होगा।” उन्होंने साथी अभिनेत्री शबाना आजमी को लेकर भी आशंका जताई थी कि क्या वह इस दायरे से बाहर निकल पाएंगी।

एक किस्सा यश चोपड़ा के साथ जुड़ा है, जिन्होंने एक बार शूटिंग से ठीक पहले स्मिता को अपनी फिल्म से हटा दिया था, और यह खबर खुद देने की बजाय शशि कपूर के जरिए पहुंचाई। इस पर स्मिता ने दुख जताते हुए कहा था, “आपको खुद बताना चाहिए था। जब शशि ने बताया तो बुरा लगा।”
‘नमक हलाल’ के रेन डांस सीन के दौरान भी स्मिता असहज रहीं। अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि वह पूरे समय यही सोचती रहीं कि उन्हें ऐसा क्यों करना पड़ रहा है। उन्होंने बाद में माना कि यह दृश्य उनकी सोच और संस्कृति से मेल नहीं खाता था और इससे उन्हें शर्मिंदगी हुई। एक बार तो उन्होंने स्क्रिप्ट में दिए डायलॉग “मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं” को कहने से भी मना कर दिया। आखिरकार, वह सिर्फ इतना कहने को तैयार हुईं “मैं मां बनने वाली हूं।”
स्मिता पाटिल की कहानी सिर्फ एक अदाकारा की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक कलाकार अपनी पहचान, स्वाभिमान और सिनेमा की गरिमा को बनाए रखने के लिए लगातार लड़ती है।

