हरीश साल्वे ने किया संविधान संशोधन विधेयक 2025 का समर्थन, कहा- जेल से सरकार चलाना लोकतंत्र का अपमान

नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) संशोधन विधेयक 2025 का समर्थन करते हुए इसे “समझदारी भरा कदम” बताया है। साल्वे ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में ऐसा कानून लाने की जरूरत पड़ी, लेकिन अब समय आ गया है कि यह स्पष्ट कर दिया जाए कि कोई भी व्यक्ति जेल में बैठकर सरकार नहीं चला सकता।


बता दें कि यह विधेयक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को गंभीर अपराधों में जेल में रहते हुए सरकारी पद से हटाने से संबंधित है। यदि किसी जनप्रतिनिधि को कम से कम पांच साल की सजा वाले अपराध में लगातार 30 दिनों तक जेल में रहना पड़ता है, तो 31वें दिन वह अपने पद से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। यह प्रस्ताव गृहमंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में बुधवार को पेश किया गया और अब इसे संसदीय संयुक्त समिति को सौंपा गया है।
पत्रकारों से बात करते हुए साल्वे ने कहा, “यह बेहद शर्मनाक है कि हमें आज के दौर में ऐसा कानून बनाना पड़ रहा है, जो यह कहे कि नेता जेल से सचिवालय नहीं चला सकते। क्या हमने सच में अपने लोकतंत्र से नाता तोड़ लिया है?”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह विधेयक किसी को अयोग्य नहीं ठहराता, बल्कि यह राजनेताओं को जेल से ऑफिस चलाने से रोकता है। साल्वे के मुताबिक, लोकतंत्र में नैतिकता की कसौटी सबसे ऊपर होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से आज के नेताओं ने खुद को विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग मान लिया है।
हरीश साल्वे ने 1991 के चर्चित हवाला डायरी घोटाले का उदाहरण देते हुए बताया कि उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी सहित कई नेताओं ने सिर्फ आरोप लगने पर इस्तीफा दे दिया था, जबकि उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया था।
“आडवाणी ने कहा था कि जब तक मैं अपना नाम साफ नहीं कर लेता, तब तक सार्वजनिक जीवन में नहीं लौटूंगा।”
उन्होंने कहा कि तब लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने की सोच थी, लेकिन आज माहौल पूरी तरह बदल गया है।
संविधान (130वां संशोधन) विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां केंद्र सरकार इसे लोकतंत्र की रक्षा और राजनीतिक शुचिता का सवाल मान रही है, वहीं कई विपक्षी दल इसे राजनीतिक हथियार बता रहे हैं। कुछ विपक्षी सांसदों ने समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया है, जबकि कुछ का मानना है कि संयुक्त समिति में जाकर ही सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
इस विधेयक को जांच के लिए जिस संसदीय संयुक्त समिति को भेजा गया है, उसमें लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल हैं। समिति इस बिल की समीक्षा कर अपने सुझाव संसद को देगी।
विधेयक के अनुसार, केवल उन्हीं मामलों में कार्रवाई होगी जो गंभीर अपराधों की श्रेणी में आते हैं और जिनमें कम से कम 5 साल की सजा का प्रावधान है। यह प्रावधान जेल में बंद नेताओं को सत्ता से बाहर करने की एक संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लाया गया है।
हरीश साल्वे का समर्थन इस बात की ओर इशारा करता है कि कानून की दृष्टि से यह विधेयक नैतिक मूल्यों और शासन की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जरूरी है। उन्होंने नेताओं से आग्रह किया कि वे सत्ता को कर्तव्य और सेवा का माध्यम समझें, न कि विशेषाधिकार की कुर्सी।

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