नई दिल्ली, 30 सितम्बर (अशोक “अश्क”) साल 2050 में आपका बच्चा जिस क्लासरूम में पढ़ेगा, वह आज के स्कूल जैसा बिल्कुल नहीं होगा। ना ब्लैकबोर्ड, ना एक जैसी किताबें, और ना ही परीक्षा के नंबरों से तौलने वाली शिक्षा। हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एजुकेशन के हालिया फोरम में प्रसिद्ध कॉग्निटिव साइंटिस्ट हॉवर्ड गार्डनर ने भविष्य की शिक्षा व्यवस्था को लेकर स्पष्ट रूप से कहा, “सबको एक जैसा पढ़ाना और एक जैसे टेस्ट से आंकना, 2050 तक बीते युग की बात हो जाएगी।”

गार्डनर के मुताबिक, भविष्य में स्कूल बच्चों को शुरुआती वर्षों में केवल बुनियादी चीजें सिखाएंगे जैसे पढ़ना, लिखना, गणित, शायद कोडिंग। इसके बाद शिक्षा का ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा। बच्चे प्रोजेक्ट-बेस्ड, रिसर्च-आधारित और AI-सहायता से सीखेंगे। वे क्या सोचते हैं, क्या बनाते हैं और कैसे सीखते हैं, इन्हीं से उनका मूल्यांकन होगा न कि एक जैसे बोर्ड परीक्षाओं से।
भारत में हालांकि तस्वीर अब भी पुरानी है। औसत स्कूलों में बच्चे आज भी रटने, दोहराने और अंक लाने की दौड़ में लगे हैं। शिक्षा उस दुनिया के लिए तैयार कर रही है जो अब रही ही नहीं। लेकिन जब दुनिया भर में AI एजुकेशन को बदल रही है, तब बड़ा सवाल है, क्या भारत ये बदलाव अपनाने को तैयार है?
फोरम में यह बात भी सामने आई कि भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल पिछड़ी हुई नहीं है, बल्कि दो हिस्सों में बंटी हुई है। नोएडा का 13 साल का बच्चा यूट्यूब से स्पेनिश सीख रहा है, Reddit से AI टूल्स पकड़ रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश के गांव का उसका चचेरा भाई टूटी ब्लैकबोर्ड पर जोड़-घटाव सीख रहा है।
यहीं असली समस्या है एक ही देश, दो अलग-अलग शैक्षणिक संसार।
आज का इंडियन एजुकेशन सिस्टम न तो इनोवेटर्स के लिए है, न क्रिटिकल थिंकर्स के लिए। ये सिस्टम अंग्रेजों की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया था तय उम्र की क्लास, एक जैसी किताबें, और परीक्षा आधारित मूल्यांकन। इसने सोचने वाले बच्चों को हतोत्साहित किया और सिर्फ रटने वालों को इनाम दिया।
हरियाणा की एक निजी यूनिवर्सिटी की चेयरपर्सन अनीशा धवन कहती हैं कि आने वाली शिक्षा सिर्फ कंटेंट डिलीवरी नहीं होगी, बल्कि जिज्ञासा, नैतिकता और बहुविषयक सोच पर आधारित होगी। AI सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि एक आईना है जो हमारी पुरानी होती शिक्षा व्यवस्था को दिखा रहा है।
भविष्य का शिक्षक सिर्फ लेक्चर देने वाला नहीं होगा। वह होगा ‘क्यूरियोसिटी कोच’, ‘एथिकल गाइड’ और ‘प्रोजेक्ट मेंटर’। दिल्ली के एक नामी स्कूल की प्रिंसिपल दीपिका कुलश्रेष्ठ मानती हैं कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली बच्चों को सोचने का मौका ही नहीं देती। क्लास 11 का छात्र भी AI पर नैतिक विचार नहीं कर सकता, क्योंकि उसने सिर्फ परीक्षा पास करना सीखा है, सोचना नहीं।
इसलिए सिर्फ नई नीति या रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा। हमें जमीनी बदलाव लाने होंगे। बच्चों को तय कोर्स से निकालकर उन्हें अपना रास्ता खुद चुनने देना होगा जैसे इतिहास के साथ कोडिंग, संस्कृत के साथ रोबोटिक्स या क्लाइमेट साइंस के साथ लिटरेचर।
इसके लिए जरूरी है कि हर बच्चे को इंटरनेट और उपकरणों की पहुंच मिले। AI-आधारित असेसमेंट सिस्टम हो, कम्युनिटी लर्निंग हब बनें और शिक्षक भविष्य की जरूरतों के अनुसार ट्रेन हों।
कहने का अर्थ साफ है इंडियन स्कूलिंग की एक्सपायरी डेट आ चुकी है। और अब बदलाव केवल विकल्प नहीं, बल्कि ज़रूरत बन चुका है।

