नई दिल्ली, 9 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) भारत में पिछले तीन दशकों में धूप के घंटे लगातार घटते जा रहे हैं और अब यह बदलाव केवल एहसास नहीं, बल्कि वैज्ञानिक डेटा द्वारा प्रमाणित है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरलॉजी (IITM), और इंडिया मीटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) की संयुक्त स्टडी के अनुसार, 1988 से 2018 के बीच देश के अधिकतर हिस्सों में सालाना धूप के घंटों में गिरावट दर्ज की गई है।

स्टडी ‘नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुई है, जिसमें देशभर के 20 मौसम स्टेशनों से 30 वर्षों का डेटा जांचा गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि पश्चिमी तट पर हर साल औसतन 8.6 घंटे, उत्तरी मैदानी इलाकों में 13.1 घंटे, पूर्वी तट पर 4.9 घंटे, डेक्कन पठार में 3.1 घंटे और मध्य भारत में 4.7 घंटे की गिरावट हुई है।
मुख्य कारण हैं बढ़ता एरोसोल प्रदूषण और मोटे बादल। वैज्ञानिकों के मुताबिक, एरोसोल छोटे-छोटे कण होते हैं जो फैक्ट्रियों, वाहनों और बायोमास जलने से हवा में घुलते हैं। ये कण बादलों के बनने में ‘बीज’ का काम करते हैं, जिससे लंबे समय तक आसमान में बादल छाए रहते हैं और धूप कम जमीन तक पहुंचती है।
स्टडी में यह भी बताया गया कि सूखे महीनों (अक्टूबर से मई) में कुछ क्षेत्रों में धूप बढ़ी है, लेकिन मॉनसून के दौरान (जून से सितंबर) धूप में बड़ी गिरावट आई है। खासकर 2025 के इस साल में लंबा मॉनसून और लगातार बादलों ने धूप को लगभग गायब कर दिया है।
इस बदलाव का असर कई क्षेत्रों पर पड़ रहा है:
- मौसम मॉडलिंग: बदलते बादल और प्रदूषण पैटर्न से मौसम की सटीक भविष्यवाणी में बाधा आ रही है।
- सोलर एनर्जी: भारत दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता सोलर मार्केट है, लेकिन कम धूप से बिजली उत्पादन प्रभावित होगा।
- खेती: फसलें सूरज की रोशनी पर निर्भर हैं। खासकर खरीफ के बाद की रबी फसलें धूप की कमी से प्रभावित होगी।वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि यह ट्रेंड जारी रहा तो भारत को प्रदूषण नियंत्रण, क्लाउड मॉनिटरिंग और स्वच्छ हवा की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। विकास के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखना अब और भी जरूरी हो गया है।

