नई दिल्ली, 7 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) आज से ठीक 40 साल पहले, 7 अक्टूबर 1985 को एक फिल्म आई थी जिसने नारी सशक्तिकरण को नए स्वर में परिभाषित किया नाम था ‘आखिर क्यों?’ यह फिल्म सिर्फ एक सामाजिक ड्रामा नहीं थी, बल्कि स्मिता पाटिल के शानदार अभिनय के कारण एक ऐसी मिसाल बन गई जिसने आर्ट सिनेमा और मुख्यधारा फिल्मों के बीच की रेखा को मिटा दिया।

स्मिता पाटिल ने निशा शर्मा का किरदार निभाया, एक ऐसी शांत और विनम्र महिला, जो शादी के बंधन और सामाजिक दबावों में पिसते हुए भी अपनी पहचान तलाशने निकलती है। पति कबीर (राकेश रोशन) से बार-बार भावनात्मक जुड़ाव और बदलाव की गुहार लगाती है, लेकिन जब कोई रास्ता नहीं दिखता, तो वो बिना शोर मचाए, चुपचाप अपने आत्मसम्मान की राह पकड़ती है।
‘आखिर क्यों?’ के पहले हिस्से में निशा की पीड़ा झलकती है, लेकिन दूसरे हिस्से में वह खुद से मिलने का साहस दिखाती है। वह हमेशा पुरुषों से घिरी रहती है, जो उसके लिए फैसले लेना चाहते हैं, लेकिन निशा खुद के निर्णय खुद लेती है—बिना किसी भाषण या विद्रोह के। यह वह फेमिनिज्म है जो आंदोलन नहीं करता, लेकिन गहराई से असर छोड़ता है।
इस फिल्म में स्मिता के साथ राजेश खन्ना और राकेश रोशन जैसे सितारे भी थे, लेकिन हर फ्रेम में स्मिता का संयमित और प्रभावशाली अभिनय सब पर भारी पड़ा। यह वही स्मिता पाटिल थीं, जिन्होंने समानांतर सिनेमा से शुरुआत की, और फिर ‘आखिर क्यों?’ जैसी फिल्मों से साबित किया कि व्यावसायिक सिनेमा में भी गहराई लाई जा सकती है।
40 साल बाद भी ‘आखिर क्यों?’ नारी आत्मसम्मान, पहचान और मौन संघर्ष की एक अहम कहानी बनकर कायम है। स्मिता पाटिल का किरदार आज भी यह बताता है कि सादगी और संवेदनशीलता से भी क्रांति लाई जा सकती है।

