दरभंगा (अशोक “अश्क”) जिले में समाहरणालय संवर्ग के लिपिकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल के चलते प्रशासनिक व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो गई है। समाहरणालय से लेकर अनुमंडल, प्रखंड और अंचलों तक फाइलें अटकी पड़ी हैं। आम लोग भूमि संबंधी कार्य, पेंशन, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, जाति एवं आवासीय प्रमाणपत्र, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं आदि के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

हड़ताल पर बैठे लिपिकों ने आम नागरिकों की समस्याओं पर संवेदना जताते हुए इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि वर्षों से वे पद और ग्रेड-पे में हो रहे भेदभाव, वेतन विसंगति, पदोन्नति, कार्यभार के अनुसार वेतनमान, पेंशन लाभ और संवर्गीय ढांचे में सुधार जैसी 10 सूत्री मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
लिपिकों ने बताया कि उन्होंने पहले काली पट्टी बांध कर, फिर धरना-प्रदर्शन के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुंचाई, पर जब कोई समाधान नहीं मिला तो बिहार अनुसचिवीय कर्मचारी संघ के आह्वान पर 9 अगस्त से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार शुरू किया गया।
संजय कुमार ठाकुर, अनीता, पप्पू लाल देव, डोला नंद चौधरी, सूर्य कुमार महतो और अन्य आंदोलनकारी लिपिकों ने बताया कि सुबह से शाम तक कठिन परिश्रम के बावजूद उन्हें समय पर प्रमोशन और वेतन वृद्धि जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। इससे वे मानसिक दबाव में काम करने को मजबूर हैं।
जिले में समाहरणालय संवर्ग के 337 पद स्वीकृत हैं, लेकिन फिलहाल सिर्फ 202 पदों पर ही लिपिक कार्यरत हैं। मनीष कुमार, संतोष मंडल, ललित पासवान और अभिमन्यु सक्सेना जैसे कर्मचारियों ने बताया कि पद की तुलना में कम स्टाफ होने से उन्हें अतिरिक्त काम करना पड़ता है। बावजूद इसके, वेतन और पेंशन संबंधी विसंगतियां बनी हुई हैं।
लिपिकों का कहना है कि वे प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हुए भी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि उनकी 10 सूत्री मांगों को शीघ्र स्वीकार कर पद और ग्रेड-पे में भेदभाव को खत्म किया जाए।
सरकार ने आश्वासन दिया है कि मामले की गहन समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। जरूरत पड़ी तो केंद्र सरकार से भी बात की जाएगी।
















