खुद के मृत होने की सूचना सुन फुटकर रो पड़ी सेवानिवृत्त शिक्षिका, बीएलओ को नोटिसजिंदा इंसान को किया मृत घोषित शिक्षिका मेरी टोप्पो और पूरे परिवार को किया मताधिकार से वंचित

पटना (सेंट्रल डेस्क) लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होती हैं जब हर नागरिक को वोट का अधिकार मिले। लेकिन आरा में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने इस अधिकार पर ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। 74 वर्षीय शिक्षिका मेरी टोप्पो, जिन्होंने पूरी जिंदगी पढ़ाई-लिखाई और मतदान से लोकतंत्र को मजबूत करने में लगाया,चुनाव आयोग की लापरवाही की शिकार हो गईं। बीएलओ ने उन्हें “मृत” घोषित कर दिया और उनके तीनों बेटों का भी नाम मतदाता सूची से काट दिया गया।


यह घटना न सिर्फ एक परिवार के अधिकारों पर चोट है, बल्कि यह सवाल खड़ा करती है कि क्या देश में मतदाता सूची इतनी असुरक्षित है कि किसी भी जिंदा इंसान को “कागज पर मरा हुआ” दिखाया जा सकता है? उन्होंने बताया कि “मैं सामने बैठी हूं फिर भी मुझे मृत बता दिया” पूर्व मोंटेसरी शिक्षिका मेरी टोप्पो जब यह सुनती हैं कि मतदाता सूची में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है, तो उनकी आंखें भर आती हैं। वह कहती हैं “मैं सामने बैठी हूं… लेकिन सरकार ने मुझे मृत घोषित कर दिया। यह सिर्फ मेरी नहीं, लोकतंत्र की हत्या है। सरकार कागज पर एक जिंदा इंसान को मार रही है।”


मेरी टोप्पो का आरोप है कि उनके तीनों बेटों चंदन टोप्पो (40) दिल्ली में नौकरी, आलबर्ट (सूची में आलबीटु लिखा गया) वाराणसी में काम, क्लारेंस टोप्पो (38) आरा निवासी, का नाम भी मतदाता सूची से हटा दिया गया। सबसे छोटे बेटे क्लारेंस ने कहा “यह लापरवाही चुनाव आयोग की है। बीएलओ ने न तो हमसे संपर्क किया,न सत्यापन किया। अचानक हमें वोट के अधिकार से वंचित कर दिया गया। खबर मीडिया में आने के बाद आज सुबह बीएलओ घर पर पहुंचा।”
क्लारेंस के दोस्त अभिषेक द्विवेदी ने बताया कि मामला यादव विद्यापीठ प्लस टू हाई स्कूल के बूथ संख्या 223 का है। जब उन्होंने सुबह सूची देखी तो टोप्पो परिवार का नाम गायब पाया। बीएलओ विनोद कुमार यादव से पूछने पर जवाब मिला कि ट्रेस नहीं हो सके, इसलिए नाम काट दिए गए। वार्ड कमिश्नर ने कहा कि ज्यादा उम्र है मर गई होगी। अभिषेक द्विवेदी ने कहा “गरीब हो या अमीर, वोट देने का अधिकार सबका है। लेकिन अनुसूचित जाति-जनजाति से जुड़े लोगों के नाम काटना सीधा अन्याय है।
मेरी टोप्पो पिछले 50 साल से आरा में रह रही हैं। उन्होंने हर चुनाव में मतदान किया है। अब जब अचानक उन्हें मृत बताकर वोटिंग अधिकार छीन लिया गया, तो यह न सिर्फ व्यक्तिगत अपमान है बल्कि लोकतंत्र की प्रक्रिया पर भी कलंक है।
क्या बिना सत्यापन किसी भी जीवित मतदाता को मृत घोषित किया जा सकता है?
क्या मतदाता सूची से नाम काटने की प्रक्रिया इतनी कमजोर है?
अगर एक पढ़ी-लिखी शिक्षिका और उनका परिवार इस लापरवाही का शिकार हो सकता है तो आम नागरिकों का क्या होगा?
यह मामला सिर्फ मेरी टोप्पो या उनके परिवार का नहीं है। यह सवाल है भारत के हर उस नागरिक का, जिसके पास वोट देने का संवैधानिक अधिकार है। क्योंकि अगर सरकार और आयोग कागज पर किसी को भी ‘ मार’ सकते हैं, तो लोकतंत्र की नींव कितनी सुरक्षित है?

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