बाढ़, बेरोजगारी और विकास की जद्दोजहद के बीच कल्याणपुर में फिर जदयू की अग्निपरीक्षा

समस्तीपुर (अशोक “अश्क”) जिले के कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र (सुरक्षित) की सियासत एक बार फिर गर्मा रही है। बागमती और गंडक नदी की बाढ़ से हर साल तबाह होने वाले इस इलाके की राजनीतिक दिशा बीते डेढ़ दशक से स्थिर रही है। 2008 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद से यह सीट जदयू के कब्जे में है। मौजूदा विधायक और राज्य सरकार में सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री महेश्वर हजारी इस बार लगातार तीसरी बार जीतने की तैयारी में जुटे हैं।


कल्याणपुर विधानसभा की स्थापना 1967 में हुई थी। तब से अब तक हुए 16 चुनावों में समाजवादी धारा के दलों का वर्चस्व रहा है। कांग्रेस सिर्फ तीन बार जीत पाई। आरक्षण लागू होने के बाद से जदयू यहां लगातार जीत रहा है। खास बात यह है कि 2010, 2015 और 2020 में यहां से जदयू के तीन अलग-अलग चेहरों ने जीत दर्ज की, लेकिन सभी एक ही परिवार से हैं—रामसेवक हजारी, उनकी बहू मंजू कुमारी और अब उनके बेटे महेश्वर हजारी।
महेश्वर हजारी का दावा है कि क्षेत्र में बाढ़ पीड़ितों के लिए व्यापक स्तर पर विकास कार्य हुए हैं। उन्होंने कहा, “हमने सड़क और पुल-पुलियों का जाल बिछाया है। कलौंजर और नामापुर जैसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में भी तीन बड़े पुलों का निर्माण हुआ है। आमस-दरभंगा एक्सप्रेस-वे से दर्जनों पंचायतों को सीधा लाभ होगा। जल्द ही उच्चतर शिक्षा की व्यवस्था शुरू की जाएगी।”
हालांकि विरोधी दल इन दावों पर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व प्रत्याशी रंजीत राम का कहना है कि “पलायन रोकने और रोजगार देने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। महादलित टोलों में सड़कें नहीं बनीं। बाढ़ और कटाव के स्थायी समाधान की कोई योजना नहीं बनी। बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए आज भी बाहर जाना पड़ता है।”
जनसुराज के प्रशांत किशोर भी इस क्षेत्र में सक्रिय हो चुके हैं और स्थानीय मुद्दों पर सभाएं कर चुके हैं। वहीं महागठबंधन भी इस सीट पर सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश में है। पिछली बार यह सीट भाकपा (माले) को दी गई थी। दूसरी ओर, लोजपा (रामविलास) अब एनडीए का हिस्सा है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
कल्याणपुर और पूसा दो प्रखंडों वाला यह विस क्षेत्र मुख्यतः कृषि पर निर्भर है। हर साल यहां की बड़ी आबादी बाढ़ और कटाव की चपेट में आ जाती है। बीते पांच वर्षों में करीब 300 घर और 500 एकड़ भूमि नदी में समा चुकी है। जलनिकासी, सिंचाई, और जूट मिल के पुनरुद्धार जैसे मुद्दे अब भी अधूरे हैं।
बाढ़, पलायन, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की मांग के बीच कल्याणपुर की जनता इस बार किसे चुनती है, यह देखना दिलचस्प होगा। सत्ता पक्ष के लिए यह परीक्षा की घड़ी है, वहीं विपक्ष बदलाव की आस में जनता को साधने की कोशिश में है।

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