नई दिल्ली 29 अगस्त (अशोक “अश्क) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के रिटायरमेंट को लेकर दिए गए बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। गुरुवार को विज्ञान भवन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि 75 वर्ष की उम्र में रिटायर होना चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं न तो स्वयं सेवानिवृत्त हो रहा हूं और न ही किसी को ऐसा करने के लिए कह रहा हूं।”

भागवत ने कहा कि संघ में पद स्वेच्छा से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के आधार पर दिए जाते हैं। “स्वयंसेवक को कार्य सौंपा जाता है, चाहें वह चाहे या न चाहे,” उन्होंने जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ काशी और मथुरा मंदिर आंदोलनों का समर्थन नहीं करता। हालांकि, अगर हिंदू समाज आग्रह करता है, तो संस्कृति और सामाजिक दृष्टिकोण से स्वयंसेवक इन आंदोलनों में भाग ले सकते हैं।
आरक्षण पर संघ प्रमुख ने दो टूक कहा कि संघ आरक्षण का समर्थन करता है और इस विषय में संघ पहले ही सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर चुका है।
भागवत के इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “ना रिटायर होऊंगा, ना होने दूंगा। जब अपनी बारी आई तो नियम बदल दिए। यह दोहरापन अच्छा नहीं है। अपनी बात पलटने वालों पर पराया तो क्या, अपना भी विश्वास नहीं करता। जो विश्वास को खो देता है, वह राज भी खो देता है।”
इस टिप्पणी को सीधे तौर पर भागवत पर निशाना माना जा रहा है, भले ही अखिलेश ने किसी का नाम नहीं लिया।
महिलाओं की भूमिका पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि संघ में महिलाओं की भी प्रभावशाली भूमिका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शाखाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन महिलाएं संघ प्रेरित संगठनों की प्रमुख भी हैं और दोनों की भूमिका परस्पर पूरक है।
मोहन भागवत के इस बयान ने न केवल रिटायरमेंट की उम्र को लेकर, बल्कि संघ की नीतियों और विचारधारा पर भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

