
नई दिल्ली/पटना डेस्क। बिहार के चर्चित पूर्व सांसद आनंद मोहन की समयपूर्व रिहाई का मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र में आ गया है। गुरुवार को हुई अहम सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार से कई कड़े सवाल पूछे और मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए कि ड्यूटी पर तैनात किसी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी की हत्या जैसे गंभीर अपराध को सामान्य मामलों की तरह नहीं देखा जा सकता।
‘लोकसेवक की हत्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता’
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि ड्यूटी निभा रहे किसी लोकसेवक की हत्या न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र पर सीधा हमला है। अदालत ने सवाल किया कि क्या ऐसे अपराध को भी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” जैसी गंभीर श्रेणी में नहीं माना जाना चाहिए? कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में दोषियों को समयपूर्व रिहाई का लाभ मिलता है तो इससे कानून-व्यवस्था और शासन व्यवस्था पर गलत संदेश जा सकता है।
– बिहार सरकार से मांगा पैरोल और जेल रिकॉर्ड
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि बिहार सरकार ने आनंद मोहन की पैरोल, जेल आचरण और अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों की पूरी जानकारी सजा माफी बोर्ड के समक्ष नहीं रखी। उन्होंने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार आनंद मोहन को कई बार पैरोल दी गई थी, लेकिन इन पहलुओं पर समुचित विचार नहीं किया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा कि क्या सजा माफी बोर्ड के सामने दोषी के खिलाफ लंबित मामलों, पैरोल और जेल रिकॉर्ड से जुड़ी सभी जानकारियां रखी गई थीं। अदालत ने राज्य सरकार को पैरोल से संबंधित सभी दस्तावेज और तिथियों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
– 2023 में नियम बदलने के बाद मिली थी रिहाई
बिहार सरकार ने वर्ष 2023 में जेल मैनुअल के नियमों में संशोधन किया था। इसी संशोधन के बाद आनंद मोहन को समयपूर्व रिहा किया गया। इस फैसले को दिवंगत आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनका आरोप है कि नियमों में बदलाव विशेष रूप से आनंद मोहन को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया।
-1994 का चर्चित जी. कृष्णैया हत्याकांड
यह मामला वर्ष 1994 का है। मुजफ्फरपुर में गैंगस्टर छोटन शुक्ला की शवयात्रा के दौरान तत्कालीन गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इस मामले में आनंद मोहन पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में पटना हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया। वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था।
-फैसले पर टिकीं सभी की निगाहें
सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शीर्ष अदालत बिहार सरकार द्वारा 2023 में किए गए नियम संशोधन और उसके आधार पर दी गई समयपूर्व रिहाई को वैध मानती है या इस मामले में कोई नया निर्देश जारी करती है। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य में गंभीर अपराधों में दोषियों की समयपूर्व रिहाई से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है।

