नई दिल्ली, 30 अगस्त (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या बंगाली भाषा बोलना किसी व्यक्ति को देश से निर्वासित करने का आधार बन सकता है। यह मामला उस समय उठा जब पश्चिम बंगाल सरकार के प्रवासी श्रमिक कल्याण बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि कई लोगों को सिर्फ बंगाली बोलने के कारण अवैध प्रवासी मानकर देश से बाहर निकाला जा रहा है, जबकि उनकी नागरिकता की पुष्टि किसी अधिकारी या न्यायाधिकरण द्वारा नहीं की गई है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने माना कि सीमा सुरक्षा बलों को अवैध प्रवासियों को रोकने का अधिकार है, क्योंकि वे देश की जनसांख्यिकी, सुरक्षा और संसाधनों पर बोझ डालते हैं। लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निर्वासन की प्रक्रिया में कानूनी और मानवीय प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि बिना उचित नागरिकता जांच के लोगों को सीमा से बाहर भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने बताया कि ऐसे लोग बांग्लादेश और भारत दोनों तरफ की गोलियों का शिकार बनते हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि बंगाली भाषा बोलना निर्वासन का आधार नहीं है, लेकिन भारत अवैध प्रवासियों के लिए “दुनिया की राजधानी” भी नहीं बन सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राज्य ऐसे लोगों को प्रोत्साहित कर रहे हैं और सीमा पर रैकेट सक्रिय हैं जो व्यवस्थित रूप से अवैध प्रवास को बढ़ावा दे रहे हैं।
पीठ ने यह भी स्वीकार किया कि यह एक जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है और असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल तथा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की बांग्लादेश से सटी सीमाएं कई जगह खुली हैं, जिससे बड़ी संख्या में अवैध प्रवास हो रहा है। लेकिन साथ ही कोर्ट ने कहा कि भाषा और संस्कृति की समानता, जैसे कि बंगाली या पंजाबी बोलना, किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने का आधार नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अवैध प्रवासियों को वापस भेजना कोई समस्या नहीं है, लेकिन जिन लोगों को निर्वासित किया जा रहा है, उनके पहचान पत्र की जांच आवश्यक है। कोर्ट ने केंद्र से इस मसले पर विस्तृत हलफनामा मांगा है और कहा है कि मामले की निगरानी स्वयं सुप्रीम कोर्ट करेगा।

