नई दिल्ली, 6 सितंबर (अशोक “अश्क”) 3 सितंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वस्तु एवं सेवा कर (GST) की नई दरों की घोषणा करते हुए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए। जहां एक ओर रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएं और अधिकांश खाद्य सामग्री 5% GST स्लैब में रखी गईं, वहीं दूसरी ओर सिगरेट और तंबाकू जैसे हानिकारक उत्पादों पर कर की दर बढ़ाकर 40% कर दी गई है। इसके उलट, बीड़ी पर GST घटाकर 18% कर दिया गया है, जिससे अब बीड़ी पहले से सस्ती हो जाएगी।

बीड़ी निर्माण में उपयोग होने वाले तेंदू पत्तों पर भी GST घटाकर 18% से 5% कर दिया गया है। अभी तक इन सभी उत्पादों पर 28% की समान दर लागू थी। लेकिन ताजा बदलाव के बाद बीड़ी और सिगरेट-तंबाकू की कीमतों में अंतर साफ नजर आएगा। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है, खासतौर पर बिहार में, जहां इसे आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है।
केरल कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश में एक विवादास्पद ट्वीट किया, जिसमें बिहार की तुलना बीड़ी से कर दी गई। यह ट्वीट सोशल मीडिया पर उल्टा पड़ गया और इसे लेकर कांग्रेस को आलोचना का सामना करना पड़ा। बिहार के नेताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे राज्य का अपमान बताया।
सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जब सिगरेट और तंबाकू जैसे उत्पादों पर 40% GST लगाया गया है, तो बीड़ी पर यह रियायत क्यों दी गई है? सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने सरकार से पूछा है कि अगर सिगरेट हानिकारक है, तो क्या बीड़ी सुरक्षित है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बीड़ी पर कर में कटौती का उद्देश्य देश के घरेलू बीड़ी उद्योग को राहत देना है। यह उद्योग भारत के असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा है और इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यरत हैं। ट्रेड यूनियनों के अनुसार, बीड़ी उद्योग में 60 से 70 लाख लोग काम करते हैं, जबकि श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, करीब 40 लाख लोग सीधे इस उद्योग से जुड़े हुए हैं।
स्वदेशी जागरण मंच और RSS से जुड़े संगठनों ने भी बीड़ी पर GST घटाने की मांग की थी। उन्होंने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर बताया था कि 28% GST के कारण रजिस्टर्ड बीड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स पर बुरा असर पड़ा है और इससे मजदूरों की आजीविका खतरे में पड़ रही है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नई GST दरें 22 सितंबर से लागू होंगी। हालांकि, तंबाकू उत्पाद जैसे सिगरेट, पान मसाला, गुटखा और बीड़ी पर मौजूदा दरें तब तक लागू रहेंगी जब तक उनके क्षतिपूर्ति उपकर से संबंधित लोन और ब्याज का भुगतान पूरा नहीं हो जाता।
यह फैसला आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अहम माना जा रहा है, और इसके असर आगामी चुनावों में देखने को मिल सकते हैं।

