पटना, 8 सितम्बर (अशोक “अश्क”) बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, महागठबंधन के भीतर मतभेद और असहमति की खाई गहराती जा रही है। खासकर सीट बंटवारे और मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। 2020 के चुनाव में अपनाए गए फार्मूले को दोहराना अब संभव नजर नहीं आ रहा है। गठबंधन के प्रमुख घटक दल अपने-अपने हितों को लेकर अड़े हैं, जिससे महागठबंधन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने समन्वय के साथ सीटों का बंटवारा किया था। लेकिन इस बार वही फार्मूला लागू कर पाना मुश्किल दिखाई दे रहा है। सीटों की मांग को लेकर पार्टियों के बीच तनातनी तेज हो गई है। सीपीआई माले ने 40 सीटों की मांग कर गठबंधन में एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। वहीं, कांग्रेस भी 70 सीटों की दावेदार है, जबकि विकासशील इंसान पार्टी के मुखिया मुकेश साहनी 60 सीटों पर दावा जता चुके हैं।
इस प्रकार, सभी दलों की बड़ी-बड़ी मांगों के बीच मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कैसे सभी को संतुष्ट करते हुए संतुलन बनाए रखे। यदि गठबंधन इस टकराव को समय रहते सुलझा नहीं पाया, तो इसके गंभीर चुनावी परिणाम हो सकते हैं।
सीट बंटवारे के साथ-साथ मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर भी असहमति सामने आई है। जहां मुकेश साहनी ने तेजस्वी यादव को सीएम फेस के रूप में समर्थन देने की बात कही है, वहीं कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर चुप्पी बनी हुई है। कांग्रेस नेतृत्व की यह खामोशी यह संकेत दे रही है कि पार्टी तेजस्वी के नाम पर सहज नहीं है। इससे महागठबंधन की एकजुटता पर फिर से सवाल उठ खड़े हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर गठबंधन समय रहते एक स्पष्ट नेतृत्व नहीं तय कर पाया, तो मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिल सकता है।
सीपीआई माले द्वारा 40 सीटों की मांग यह दिखाती है कि छोटे दल भी अब अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने और हिस्सेदारी बढ़ाने में पीछे नहीं हैं। माले का दावा है कि उसने पिछली बार 12 सीटों पर जीत दर्ज की थी, इसलिए उसे इस बार अधिक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। लेकिन इसका सीधा असर राजद और कांग्रेस की सीटों पर पड़ सकता है, जो पहले ही बड़ी संख्या में सीटें मांग रहे हैं।
गठबंधन के भीतर उपजे इस संकट को सुलझाने के लिए सधे हुए राजनीतिक संतुलन की जरूरत है। जानकारों का मानना है कि राजद को कुछ सीटों की कुर्बानी देकर छोटे दलों को संतुष्ट करना पड़ सकता है, वहीं छोटे दलों को भी यह समझना होगा कि अत्यधिक मांग से गठबंधन की एकता खतरे में पड़ सकती है। सभी दलों को एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम और नेतृत्व पर सहमति बनानी होगी।
सूत्रों के अनुसार, 15 सितंबर तक सीट शेयरिंग का फार्मूला तय करना जरूरी है, अन्यथा गठबंधन टूट की कगार पर पहुंच सकता है। फिलहाल, महागठबंधन के लिए यह समय आपसी सामंजस्य और रणनीतिक लचीलापन दिखाने का है, नहीं तो इसका खामियाजा चुनावी हार के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

