बिहार चुनाव से पहले महागठबंधन में सीटों का संग्राम, कांग्रेस ने जिताऊ सीटों पर जताई दावेदारी

पटना, 11 सितम्बर (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव की आधिकारिक घोषणा भले ही न हुई हो, लेकिन राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। खासकर महागठबंधन के प्रमुख घटक दल कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह पिछली बार जैसी रणनीति में नहीं फंसेगी और इस बार कम लेकिन “जिताऊ” सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी।


2020 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 70 सीटें मिली थीं, लेकिन पार्टी सिर्फ 19 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी थी। इसका मुख्य कारण यह बताया गया कि आरजेडी ने कांग्रेस को ऐसी शहरी और एनडीए-प्रभावित सीटें दे दी थीं, जहां जीत की संभावना कम थी। अब कांग्रेस अपनी पुरानी गलतियों को दोहराना नहीं चाहती। पार्टी के बिहार प्रभारी कृष्णा अलावरू ने हाल ही में बयान दिया कि, “सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत सकारात्मक दिशा में है। सभी सहयोगियों को कुछ न कुछ सीटें छोड़नी होंगी। आने वाले दिनों में अच्छी प्रगति होगी।”
इस बार महागठबंधन में नए सहयोगियों की एंट्री ने समीकरण और जटिल बना दिए हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), वीआईपी पार्टी (मुकेश सहनी), पशुपति पारस की पार्टी और वामपंथी दल भी गठबंधन का हिस्सा हैं। ऐसे में कांग्रेस और आरजेडी दोनों को अपनी-अपनी सीटों में कटौती करनी पड़ सकती है।
2020 में आरजेडी ने 144 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 75 पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। वहीं कांग्रेस 70 सीटों में से सिर्फ 19 जीत सकी थी, यानी स्ट्राइक रेट 27% रहा। इस हार का ठीकरा आरजेडी ने कांग्रेस पर फोड़ा था और तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने का सपना अधूरा रह गया था।
कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उसे 70 में से करीब 45 सीटें ऐसी मिलीं, जहां वह पिछले चार चुनावों से हारती आ रही थी। इनमें से अधिकतर सीटें शहरी क्षेत्रों की थी जहां बीजेपी की पकड़ मजबूत है। वहीं, करीब 30 सीटें ऐसी थीं जहां खुद आरजेडी भी चार-पांच चुनावों से हार रही थी। यही कारण है कि कांग्रेस इस बार सीटों की संख्या के बजाय उनकी गुणवत्ता पर जोर दे रही है।
मिथिलांचल और सीमांचल जैसे परंपरागत गढ़ों में पिछली बार कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। मिथिलांचल में तो पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी। सीमांचल में कुछ बेहतर प्रदर्शन जरूर हुआ, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने वहां कांग्रेस को तगड़ा नुकसान पहुंचाया। इस बार कांग्रेस इन इलाकों में विशेष रणनीति के तहत काम कर रही है।
दलित और ओबीसी वोट बैंक को साधने की कोशिश में कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष पद से सवर्ण नेता अखिलेश सिंह को हटाकर दलित नेता राजेश राम को कमान सौंपी है। 2020 में कांग्रेस ने 70 में से 32 सीटों पर अगड़ी जातियों के उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन इस बार फोकस बदला गया है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस अब पुरानी भूलों को सुधारते हुए गठबंधन में “बराबरी की भागीदारी” चाहती है। सीटों की संख्या चाहे कम हो, लेकिन उन्हें ऐसी सीटें चाहिए जहां सामाजिक समीकरण और ज़मीनी हकीकत उनके पक्ष में हो। वहीं, आरजेडी को भी नए सहयोगियों की वजह से संतुलन साधने की चुनौती है। देखना होगा कि महागठबंधन का यह समीकरण आगे चलकर जीत में बदलता है या फिर अंततः अंदरूनी खींचतान का शिकार हो जाता है।

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