नई दिल्ली, 16 सितम्बर (अशोक। “अश्क”) भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं में एक अनाज ने अप्रत्याशित रूप से भू-राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है वह है मक्का। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने तंज कसते हुए भारत से सवाल किया है कि जब देश की आबादी 1.4 अरब है, तो फिर अमेरिका से एक बुशल मक्का भी क्यों नहीं खरीदा जाता?

यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर नई बातचीत शुरू हुई है और मक्का इस चर्चा का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन गया है। अमेरिका इस बात से खफा है कि भारत उसके मक्के को आयात नहीं करता। 2024-25 में भारत ने महज 1,100 टन अमेरिकी मक्का आयात किया, जो उसके कुल 0.97 मिलियन टन आयात के मुकाबले नगण्य है। भारत ज्यादातर मक्का म्यांमार और यूक्रेन जैसे देशों से आयात करता है।
भारत द्वारा अमेरिकी मक्का न खरीदने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला उच्च टैरिफ। भारत हर साल 5 लाख टन मक्का पर 15% टैरिफ लगाता है, जबकि इस सीमा से ऊपर के आयात पर 50% तक भारी शुल्क वसूला जाता है। दूसरा जीएम फसलों पर प्रतिबंध। अमेरिका का 94% मक्का आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified – GM) होता है, जबकि भारत जीएम मक्का के आयात की अनुमति नहीं देता।
चीन पहले अमेरिका का बड़ा खरीदार था, लेकिन अब वह भी पीछे हट रहा है। 2022 में चीन ने 5.2 अरब डॉलर का अमेरिकी मक्का खरीदा था, जो 2024 में घटकर मात्र 33.1 करोड़ डॉलर रह गया। इसका असर अमेरिका के कुल मक्का निर्यात पर भी पड़ा, जो 2022 में 18.57 अरब डॉलर से गिरकर 2024 में 13.7 अरब डॉलर रह गया।
पोल्ट्री, डेयरी और इथेनॉल की बढ़ती मांग के बीच भारत को अमेरिका एक उभरते हुए बाजार के रूप में देख रहा है। ऐसे में अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अमेरिकी मक्का खरीदे, लेकिन भारत अपनी घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है।
भारत में मक्का की कीमतें ₹22-23 प्रति किलो हैं, जबकि सरकारी MRP ₹24 प्रति किलो तय है। अमेरिका में मक्का उत्पादन लागत ₹15 प्रति किलो से भी कम है। अगर भारत सस्ता अमेरिकी मक्का आयात करता है, तो इससे बिहार जैसे राज्यों के किसानों को भारी नुकसान होगा, जो मक्का के प्रमुख उत्पादक हैं। चूंकि बिहार में चुनाव नजदीक हैं, इसलिए यह मसला राजनीतिक रूप से और भी संवेदनशील हो गया है।
एक समय केवल इथेनॉल निर्माण के लिए अमेरिकी मक्का के आयात का प्रस्ताव सामने आया था, लेकिन घरेलू विरोध के कारण उसे भी वापस ले लिया गया। फिलहाल भारत का रुख साफ है ना जीएम मक्का का आयात, ना ही टैरिफ में छूट।
अमेरिका भले ही अपने मक्का के लिए नया बाजार खोजने में व्यस्त हो, लेकिन भारत अभी अपने किसानों और घरेलू बाजार को प्राथमिकता दे रहा है। जब तक भारत में चुनाव नहीं हो जाते और कोई दीर्घकालिक रणनीति नहीं बनती, तब तक मक्का सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और कूटनीतिक हथियार बना रहेगा।

