स्थानीयता के रंग में रंगे पीएम मोदी, चुनावी मौसम में बिहार में फिर दिखा जनसंवाद का नया अंदाज

नई दिल्ली, 17 सितंबर (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अपने जनसंवाद के खास अंदाज से बिहारवासियों का दिल जीतने की कोशिश की। पूर्णिया एयरपोर्ट के उद्घाटन अवसर पर उन्होंने मैथिली में लोगों को संबोधित कर स्थानीयता का पुट दिया और यह संदेश दिया कि वे केवल नेता नहीं, बल्कि उसी धरती के हैं।


मैथिली, भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी स्थानीय भाषाओं में संवाद स्थापित कर प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों के दिलों से जुड़ने का प्रयास किया है। पूर्णिया की धरती पर उन्होंने कहा, ‘प्रणाम करै छी, पूर्णिया माई पूरण देवी, भक्त प्रह्लाद और महर्षि मेंही बाबा के भूमि छई। ई धरती पर फणीश्वरनाथ रेणु आरो सतीनाथ भादुड़ी जेहन उपन्यासकार पैदा लेलकई, विनोबा भावे के जैइसन समर्पित कर्मयोगी के कर्मस्थली छीयै।’
यह पहला मौका नहीं है जब मोदी ने स्थानीय भाषा में संवाद कर लोगों को चौंकाया हो। 22 अगस्त को गया में उन्होंने मगही में कहा था, ‘गयाजी के हम प्रणाम करअ ही।’ इससे पहले बेगूसराय में गंगा पुल उद्घाटन के दौरान गमछा लिए उनका बिहारी अंदाज भी खूब चर्चा में रहा था।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह केवल भाषण नहीं, बल्कि रणनीति है। पटना स्थित मौलाना मजहरुल हक विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मुकेश कुमार कहते हैं कि स्थानीय भाषा में शुरुआत लोगों को सहज बना देती है। प्रधानमंत्री पहले संस्कृति और परंपरा से तारतम्य बनाते हैं, फिर अपनी बात रखते हैं। यह शैली आमजन में जुड़ाव बनाती है।
मगध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एसपी शाही का मानना है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी बिहार के 80 से अधिक दौरों पर रह चुके हैं और राज्य के लगभग हर जिले से परिचित हैं। शेखपुरा, लखीसराय, शिवहर, किशनगंज और खगड़िया को छोड़कर सभी जिलों में उनकी सभाएं हो चुकी हैं।
2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने 30 से अधिक जनसभाएं की थीं, जबकि 2020 में 12 सभाएं और रोड शो किए। 2019 के लोकसभा चुनाव में 9 और 2024 में 16 जनसभाएं कर चुके हैं। पिछली बार उन्होंने एक ही दिन में चार-चार सभाएं की थीं। इस बार भी राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की सक्रियता को देखते हुए मोदी की सभाएं अधिक होने की संभावना है।
राजनीति विज्ञानियों के अनुसार, हर बड़े नेता की टीम स्थानीय मुद्दों, इतिहास, भूगोल, संस्कृति और जनभावनाओं की जानकारी जुटाती है, लेकिन यह नेता की संप्रेषण क्षमता और जनसम्पर्क शैली पर निर्भर करता है कि वह कितनी प्रभावी होती है।
इस बार के विधानसभा चुनाव में राज्यस्तरीय मुद्दों के साथ-साथ स्थानीयता और सांस्कृतिक जुड़ाव भी बड़ा चुनावी फैक्टर साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी का यह अंदाज कि वे स्थानीय भाषाओं में जनता से संवाद करें, अन्य दलों के लिए भी एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बन गई है।

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