नई दिल्ली, 26 सितंबर ( अशोक “अश्क”) अगर संतान अपने सीनियर सिटिजन माता-पिता की देखभाल नहीं करती, तो उन्हें माता-पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि वरिष्ठ नागरिकों और माता-पिता का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल के पास संतान को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार है।
इस फैसले में जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने 12 सितंबर को एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए, सीनियर सिटिजन दंपति की अपील को स्वीकार किया।

मामले में एक 80 वर्षीय व्यक्ति और उनकी 78 वर्षीय पत्नी ने अपने बड़े बेटे के खिलाफ कार्रवाई की थी। ट्रिब्यूनल ने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया था, क्योंकि वह अपने माता-पिता की देखभाल करने में विफल रहा।
हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को अमान्य कर दिया था। इसके खिलाफ माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां से उन्हें न्याय मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बेटा जो आर्थिक रूप से सक्षम और व्यवसाय में संलग्न है ने मुंबई स्थित माता-पिता की दो संपत्तियों पर कब्जा कर लिया और जब माता-पिता उत्तर प्रदेश से वापस लौटे, तो उन्हें अपनी ही संपत्ति में रहने नहीं दिया।
अदालत ने कहा कि बेटे ने माता-पिता की देखभाल न कर और उन्हें घर से बाहर कर एक गंभीर कानूनी दायित्व का उल्लंघन किया है। सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को 30 नवंबर 2025 तक संपत्ति खाली करने का हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की, “यह कानून वरिष्ठ नागरिकों की दुर्दशा को दूर करने, उनकी देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है।”
यह फैसला उन मामलों के लिए नजीर बनेगा, जहां बुजुर्ग माता-पिता संतान की उपेक्षा का शिकार होते हैं और कानूनी अधिकारों की सुरक्षा चाहते हैं।

