नई दिल्ली, 27 सितंबर (अशोक “अश्क”) बॉलीवुड में एक्शन हीरो की छवि से पहचाने जाने वाले धर्मेंद्र को आज भी उनकी दमदार कद-काठी और हीरोइक स्टाइल के लिए याद किया जाता है। मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी सबसे सशक्त अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किसी एक्शन फिल्म में नहीं, बल्कि 1969 में आई क्लासिक फिल्म ‘सत्यकाम’ में हुआ था।
ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी ‘सत्यकाम’में धर्मेंद्र ने सत्यप्रिय का किरदार निभाया था एक ऐसा शख्स जो आज़ाद भारत में सत्य, नैतिकता और आदर्शों की कसौटी पर अपनी ज़िंदगी जीना चाहता है। यही नहीं, यह वही फिल्म है जिसने सिर्फ दर्शकों को नहीं, बल्कि कई नामचीन कलाकारों और फिल्मकारों को भी भीतर तक झकझोर दिया।

प्रसिद्ध लेखक और डायरेक्टर रंजीत कपूर ने खुद यह स्वीकार किया था कि जब उनका करियर संघर्षों से जूझ रहा था और वह अपराध के रास्ते पर जाने का मन बना चुके थे, तभी ‘सत्यकाम’ देखने का संयोग हुआ और उन्होंने अपना रास्ता बदल दिया। जय अर्जुन सिंह की किताब ‘द वर्ल्ड ऑफ ऋषिकेश मुखर्जी’ में इस किस्से का जिक्र है। रंजीत ने कहा था, “वो फिल्म देखने के बाद दुनिया एक बहुत अलग जगह लगने लगी—मैं एकदम नीचे गिर चुका था, मगर मैंने खुद को फिर से उठाया।”
फिल्म में सत्यप्रिय की भूमिका में धर्मेंद्र ने आदर्शवादी युवा का किरदार निभाया, जो सिस्टम की गंदगी के बीच भी ईमानदारी से जीने की कोशिश करता है। मगर उसकी यही सच्चाई, उसकी ज़िंदगी को एक अकेली और दुखद राह पर ले जाती है। फिल्म में उनके साथ शर्मीला टैगोर थीं, जिन्होंने एक रेप सर्वाइवर के रोल में शानदार परफॉर्मेंस दी थी।
फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई, मगर आज भी इसे धर्मेंद्र के करियर की सबसे दमदार परफॉर्मेंस माना जाता है। अभिनेता फारुख शेख से लेकर आम दर्शक तक, ‘सत्यकाम’ को एक जिंदगी बदल देने वाली फिल्म के रूप में याद करते हैं।
‘सत्यकाम’ न सिर्फ एक फिल्म थी, बल्कि एक विचार था—कि क्या सच और आदर्शों पर टिके रहकर भी जीवन जिया जा सकता है? शायद जवाब कठिन हो, मगर धर्मेंद्र की यह भूमिका आज भी उस सवाल को ज़िंदा रखे हुए है।

