जमानत आदेशों में खामी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दो न्यायिक अधिकारियों को भेजा स्पेशल ट्रेनिंग पर

नई दिल्ली, 30 सितम्बर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की एक निचली अदालत के अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (एसीएमएम) और एक सत्र न्यायाधीश को उनके जमानत आदेशों में गंभीर खामियों के चलते दिल्ली ज्यूडिशियल अकादमी में विशेष प्रशिक्षण के लिए भेजने का निर्देश दिया है। यह आदेश ऐसे वक्त आया जब एक आदतन अपराधी दंपती को निचली अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने अनुचित करार दिया।


जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह फैसला न्यायिक स्वतंत्रता या आरोपी के अधिकारों को कमजोर करने के लिए नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि आरोपी दंपती का आपराधिक इतिहास और व्यवहार ऐसा था कि उन्हें जमानत नहीं दी जानी चाहिए थी।
दंपती पर छह समान आपराधिक मामलों में शामिल होने का आरोप है। उन्होंने 1.9 करोड़ रुपये की ठगी की थी। यह ठगी एक पहले से बेची हुई जमीन को दोबारा बेचने के बहाने की गई थी। साल 2018 में हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत के दौरान दंपती ने पीड़ित को पैसे लौटाने का वादा किया था, जिस आधार पर उन्हें लगभग पांच वर्षों तक बेल मिली। लेकिन उन्होंने अपना वादा निभाया नहीं, जिससे 2023 में हाई कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर दी।
इसके बाद भी, आरोप पत्र दाखिल होने पर दंपती को निचली अदालत से नियमित जमानत मिल गई और सत्र न्यायालय तथा हाई कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर निचली अदालतों और हाई कोर्ट के रवैये पर आपत्ति जताई, खासतौर पर इसलिए क्योंकि हाई कोर्ट पहले ही दंपती के आचरण पर कठोर टिप्पणियां कर चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से एसीएमएम द्वारा दिए गए तर्क को गलत ठहराया, जिसमें कहा गया था कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और हिरासत की जरूरत नहीं है, इसलिए जमानत दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि यह तर्क हाई कोर्ट के आदेशों और आरोपी के वादों की अनदेखी करता है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों न्यायिक अधिकारियों को कम से कम सात दिन की विशेष ट्रेनिंग दी जाए। दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया गया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि यह प्रशिक्षण दिल्ली ज्यूडिशियल अकादमी में आयोजित हो। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य उच्च न्यायालयों के आदेशों की महत्ता और न्यायिक कार्यवाही की संवेदनशीलता को समझाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कदम न्यायिक प्रणाली में विश्वास बहाल रखने और भविष्य में ऐसी चूकों को रोकने के लिए आवश्यक है।

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