नई दिल्ली, 18 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) मानसून-2025 उत्तर भारत के लिए आपदा का पर्याय बनकर आया। विशेष रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने पहाड़ों को झकझोर कर रख दिया। वहीं, नदियों के उफान के चलते मैदानी राज्यों में अभूतपूर्व बाढ़ की स्थिति बन गई।

जून से सितंबर के बीच, देशभर में 59 स्थानों पर नदियों ने अब तक का सबसे ऊंचा जलस्तर (Highest Flood Level) पार किया। अकेले गंगा बेसिन में 22 बार जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर गया, जो इसे सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बनाता है।
केंद्रीय जल आयोग और क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा और यमुना दोनों नदियों की उद्गम स्थली उत्तराखंड में हुई अत्यधिक वर्षा और ग्लेशियरों के पिघलने ने नदियों के प्रवाह को कई गुना बढ़ा दिया। उत्तराखंड में इस बार सामान्य से 22% अधिक बारिश हुई।
यमुना नदी, जो गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है, तीसरे स्थान पर रही। इसके बेसिन में 10 बार जलस्तर चेतावनी रेखा के पार गया, जिसमें दिल्ली, यमुनानगर और मथुरा जैसे इलाके प्रमुख रहे।
सबसे अधिक तबाही अगस्त 2025 में देखने को मिली, जब अकेले 28 स्थानों पर नदियों ने अपना सर्वाधिक जलस्तर पार किया। इसके बाद सितंबर में 16, जुलाई में 13, जून और मई में एक-एक घटना दर्ज हुई।
इस विनाशकारी मानसून का सीधा असर हरिद्वार, बिजनौर, बुलंदशहर, मथुरा, प्रयागराज और पटना तक पड़ा, जहां लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए। विशेषज्ञों ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित शहरीकरण भविष्य में ऐसी आपदाओं को और गंभीर बना सकते हैं।

