नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान उच्च न्यायालयों के कुछ जजों की कार्य प्रतिबद्धता पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जहां कई जज न्याय के मशालची बनकर भारी बोझ उठाते हैं, वहीं कुछ की कार्यशैली बेहद निराशाजनक है। उनका यह बयान भारतीय न्याय व्यवस्था की आंतरिक कार्यशैली में सुधार की आवश्यकता की ओर इशारा करता है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की व्याख्यान श्रृंखला ‘न्याय सबके लिए निःशुल्क कानूनी सहायता और मध्यस्थता’ के उद्घाटन सत्र में बोल रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक कठोर सवाल उठाया, “जिनकी निष्ठा कमजोर पड़ जाती है, उनसे मेरी एक ही अपील है। हर रात तकिए पर सिर रखने से पहले खुद से पूछें कि आज मुझ पर जनता का कितना पैसा खर्च हुआ? क्या मैंने समाज के विश्वास का प्रतिदान दिया?” यह सवाल न्यायपालिका के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में एक विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हो गई है, जहां न्याय तक पहुंच केवल संपन्न वर्ग तक ही सीमित होती जा रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “जब कानूनी फीस मासिक आय से भी अधिक हो जाती है, जब प्रक्रियाएं उस साक्षरता की मांग करती हैं जो करोड़ों लोगों के पास नहीं है और जब न्यायालय की गलियारों में लोग स्वागत से अधिक भय महसूस करते हैं, तो यह वास्तविकता है कि हमने न्याय के मंदिर तो बनाए पर उनके दरवाजे उन्हीं के लिए संकरे कर दिए जिनके लिए वे बने थे।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने निःशुल्क कानूनी सहायता (Article 39A) की महत्ता पर जोर दिया और इसे केवल कानूनी दान नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे लोकतंत्र की “जीवनरेखा” बताया और बताया कि यह व्यवस्था आम लोगों को न्याय तक पहुंच प्रदान करने में अहम भूमिका निभाती है। एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ने कानूनी सहायता प्राप्त करके धोखाधड़ी से गंवाई अपनी जीवनभर की पूंजी वापस पाई।
उन्होंने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की ‘वीर परिवार सहायता योजना’ का भी उल्लेख किया, जो सैनिकों और उनके परिवारों को कानूनी सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण साबित हो रही है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के तहत लगभग 4,600 कैदियों को कानूनी प्रतिनिधित्व देने के लिए आगे आए वकीलों की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से युवा वकीलों से आग्रह किया कि वे हर माह कम से कम दो प्रो bono मामले लें, ताकि अधिक से अधिक लोग न्याय की प्रक्रिया में भागीदार बन सकें।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने न्यायिक प्रणाली में लंबित मामलों की समस्या और न्याय में हो रही देरी को भी बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा, “कई बार न्याय में देरी ही न्याय से इनकार बन जाती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि न्याय तक पहुंच केवल कागजों पर गारंटी न रहे।” यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता की ओर इशारा करती है, ताकि न्याय का वितरण समय पर और प्रभावी तरीके से हो सके।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मध्यस्थता के महत्व पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता न्यायिक प्रक्रिया का एक आवश्यक हिस्सा है, जो रिश्तों को तोड़ने के बजाय बचाए रखती है। उन्होंने “Mediation for the Nation” अभियान की सफलता का जिक्र करते हुए 2030 तक हर जिले में समर्पित मध्यस्थता केंद्र स्थापित करने का संकल्प व्यक्त किया। यह कदम न्यायिक प्रणाली को अधिक सुलभ और लोगों के लिए सस्ता बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत के यह बयान भारतीय न्याय प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं। उनकी चिंताओं से यह संदेश मिलता है कि न्यायपालिका को न केवल अपनी कार्यप्रणाली पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है, बल्कि उसे समाज के प्रत्येक वर्ग तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य करना होगा।

