नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) राष्ट्रपति की ओर से दाखिल किए गए रेफरेंस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों के विवेकाधिकार और विधानसभा विधेयकों पर निर्णय लेने के समयसीमा पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या चुनी हुई सरकार को राज्यपाल के विवेकाधिकार के भरोसे छोड़ दिया जाना चाहिए, और क्या राज्यपाल हमेशा के लिए किसी बिल को रोक सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस बीआर गवई कर रहे हैं, इस मामले में सुनवाई कर रही है। बेंच ने यह भी पूछा कि क्या राज्यपालों और राष्ट्रपति को आदेश दिया जा सकता है कि वे किसी विधेयक पर 90 दिनों के भीतर फैसला लें, खासकर जब वे उसे मंजूर करने या खारिज करने के लिए विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हैं।
चीफ जस्टिस गवई ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की, “हम राज्यपालों को पूरी शक्ति नहीं दे सकते। आखिर एक चुनी हुई सरकार, जो बहुमत से आई है, उसे राज्यपाल के विवेकाधिकार के भरोसे कैसे छोड़ सकते हैं?” उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक को रोकना न तो राज्यपाल के हित में है और न ही विधानसभा के लिए यह सही है। बेंच ने इस संदर्भ में यह सवाल किया कि क्या चुनी हुई सरकार को राज्यपाल के विवेकाधिकार पर निर्भर रहना चाहिए और क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ संगत है?
यह मामला खासतौर पर इस कारण महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ महीनों में तमिलनाडु और केरल के मामलों में शीर्ष अदालत ने यह आदेश दिया था कि राज्यपालों या राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए 90 दिनों की टाइमलाइन तय की जानी चाहिए। यदि राज्यपाल किसी विधेयक को खारिज करते हैं, तो उन्हें इस फैसले का कारण भी 90 दिनों के भीतर बताना होगा। इसी फैसले को लेकर राष्ट्रपति की ओर से एक रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया है, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या कोर्ट राज्यपाल या राष्ट्रपति को इस संबंध में आदेश दे सकती है।
इस मामले में बुधवार को दिलचस्प बहस देखने को मिली, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्यपाल के अधिकारों का बचाव किया। उन्होंने संविधान के आर्टिकल 200 का हवाला देते हुए कहा, “गवर्नर का पद रिटायर नेताओं के लिए शरण नहीं है, बल्कि उनके पास अपने अधिकार हैं। भले ही गवर्नर निर्वाचित नहीं हैं, वे राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होते हैं और उनका यह अधिकार है कि वे किसी विधेयक को मंजूरी दें, उसे होल्ड पर रखें, या फिर राष्ट्रपति के पास भेजें।”
तुषार मेहता ने आगे कहा कि यह समझना जरूरी है कि जो व्यक्ति सीधे निर्वाचित नहीं है, वह कमतर नहीं होता है। राज्यपाल के पास विवेकाधिकार है और वे सरकार के मार्गदर्शन के लिए निर्णय लेने का अधिकार रखते हैं।
यह सुनवाई उस आदेश के बाद हो रही है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों और राष्ट्रपति को 90 दिन की टाइमलाइन के भीतर विधेयकों पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह कहा था कि अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति किसी विधेयक को खारिज करते हैं तो उन्हें इसका कारण स्पष्ट रूप से बताना होगा। इससे पहले, कई विधेयकों के लंबित रहने के कारण राज्यों में राजनीतिक संकट और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो रही थी, क्योंकि सरकारें राज्यपाल के फैसले का इंतजार करती थीं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कैसे निर्णय करता है और क्या राज्यपालों के विवेकाधिकार को लेकर किसी प्रकार की नई दिशा-निर्देश जारी होते हैं। फिलहाल, यह सुनवाई जारी है और आगामी दिनों में इस मामले में और भी महत्वपूर्ण निर्णय की संभावना जताई जा रही है।

