CJI बी आर गवई का बड़ा बयान: “कार्यपालिका को जज बनने की इजाजत संविधान को कमजोर करती है”

नई दिल्ली (अशोक “अश्क”) भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी आर गवई ने शनिवार को गोवा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में शिरकत की। इस दौरान उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए कानून, संविधान और न्यायपालिका से जुड़े कई गंभीर मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी। खासतौर पर उन्होंने संविधान में निहित सेपरेशन ऑफ पावर के सिद्धांत पर जोर दिया और इसे कमजोर करने वाली प्रवृत्तियों पर चिंता जताई।


मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, “कार्यपालिका को न्यायिक भूमिका निभाने की अनुमति देना संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाया, जिसमें कार्यपालिका को जज बनने से रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। मुझे गर्व है कि हमने यह फैसला दिया।”
उन्होंने बढ़ते बुलडोजर एक्शन पर भी टिप्पणी की और संवैधानिक ढांचे की रक्षा करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, अगर कार्यपालिका को न्यायिक निर्णय लेने का अधिकार मिल गया तो इससे लोकतंत्र के स्तंभों के बीच संतुलन टूट जाएगा।
सीजेआई गवई ने क्रीमी लेयर और अनुसूचित जाति में उप-वर्गीकरण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के विवादास्पद फैसले का भी उल्लेख किया। उन्होंने स्वीकार किया कि इस फैसले की उनके ही समुदाय में तीखी आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि, “न्यायपालिका का कार्य जनता की भावनाओं या राजनीतिक दबाव के आधार पर निर्णय लेना नहीं है, बल्कि उसे संविधान, कानून और अंतरात्मा की आवाज के अनुसार फैसला करना चाहिए।”
छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता और उसमें आ रही चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देशभर के कॉलेजों में कानून के छात्र तो बड़ी संख्या में नामांकित हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे, पाठ्यक्रम और शिक्षकों की गुणवत्ता में भारी सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने हितधारकों से आह्वान किया कि वे देशभर में कानूनी शिक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में ठोस प्रयास करें।
उन्होंने छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा, “आपकी सफलता आपके परीक्षा के अंक नहीं, बल्कि आपकी मेहनत, समर्पण और पेशे के प्रति निष्ठा तय करती है। रिजल्ट ही सब कुछ नहीं होते।”
अपने कॉलेज के दिनों को याद करते हुए CJI गवई ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में साझा किया कि वह एक मेधावी छात्र थे, लेकिन अक्सर कक्षाएं छोड़ दिया करते थे। “जब मैं मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में था, तब मेरे दोस्त मेरी उपस्थिति लगवाते थे और मैं कॉलेज की दीवार पर बैठा करता था।”
उन्होंने आगे बताया कि अंतिम वर्ष में उन्हें अमरावती जाना पड़ा, क्योंकि उनके पिता महाराष्ट्र विधान परिषद के अध्यक्ष थे। “मुंबई में घर नहीं था, इसलिए मैं मुश्किल से आधा दर्जन बार ही कॉलेज जा सका। मेरे एक मित्र, जो बाद में हाईकोर्ट जज बने, मेरी उपस्थिति दर्ज कराते थे।”
मुख्य न्यायाधीश ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरे साथ पढ़ने वाला जो पहला आया था वह क्रिमिनल लॉयर बना, दूसरा हाईकोर्ट का जज और तीसरा मैं था, जो आज भारत का प्रधान न्यायाधीश हूं।”
उनके इस प्रेरणादायक भाषण ने छात्रों और उपस्थित लोगों को न केवल संवैधानिक मूल्यों की महत्ता समझाई, बल्कि यह भी बताया कि कठिन परिस्थितियों में भी सफलता संभव है।

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