
पटना, 11 जनवरी (पटना डेस्क) 2026 की मकर संक्रांति पर बिहार का परंपरागत सियासी चूड़ा-दही भोज एक बार फिर सुर्खियों में है। हर साल की तरह इस बार भी यह भोज केवल स्वाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता के समीकरणों और राजनीतिक संदेशों का मंच बन गया। खास बात यह है कि अब इस भोज का दायरा बिहार की सीमाओं से निकलकर दिल्ली तक फैल चुका है, जहां बिहार के नेता पूरे ठाठ से दही-चूड़ा परोस रहे हैं।

बिहार की राजनीति में इस भोज को हमेशा बदलाव का संकेत माना जाता है। वर्ष 2018 इसका बड़ा उदाहरण है, जब जदयू के मकर संक्रांति भोज के बाद कांग्रेस में ऐतिहासिक टूट देखने को मिली थी। उस समय जदयू नेता वशिष्ठ नारायण सिंह के आवास पर आयोजित भोज में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी विधायकों के साथ पहुंचे थे। यहीं से कांग्रेस में दरार के संकेत मिले और डेढ़ महीने बाद वे जदयू में शामिल हो गए।दिल्ली में दही-चूड़ा भोज की परंपरा की शुरुआत यूनाइटेड फ्रंट सरकार के दौर में हुई थी। रामविलास पासवान ने दिल्ली में पत्रकारों को आमंत्रित कर इसे खास पहचान दी। 2015 में उनके भोज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई दिग्गज नेता शामिल हुए थे।

वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह के यहां भागलपुर का कतरनी चूड़ा, गया का तिलकुट, पूड़ी-सब्जी और जलेबी राजनीतिक स्वाद बढ़ाते थे।पिछले साल जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने दिल्ली में भोज दिया था। इस बार रामविलास पासवान की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चिराग पासवान पटना और दिल्ली, दोनों जगह चूड़ा-दही भोज देकर सियासी हलचल तेज कर रहे हैं।

