पटना, 11 सितंबर (अशोक “अश्क”) पटना हाई कोर्ट ने बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा तीन वर्षों तक परीक्षा में शामिल होने से रोके गए परीक्षार्थी तारकेश्वर पांडेय को बड़ी राहत दी है। न्यायाधीश संदीप कुमार की एकलपीठ ने आयोग द्वारा जारी डिबारमेंट आदेश (19 फरवरी 2025) को रद करते हुए इसे गैर-कारणयुक्त और विधिसम्मत नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि बीपीएससी का आदेश बिना उचित कारण के पारित किया गया था और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता तारकेश्वर पांडेय ने बीपीएससी की 70वीं संयुक्त प्रारंभिक परीक्षा में भाग लिया था, जहां परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र वितरण में आधे घंटे की देरी हुई थी। बाद में, मीडिया चैनल पर उनकी आंशिक और संपादित बाइट वायरल हो गई, जिसके आधार पर बीपीएससी ने बिना पर्याप्त कारण बताए उन्हें तीन वर्षों (12 दिसंबर 2024 से 12 दिसंबर 2027 तक) तक आयोग की सभी परीक्षाओं से वंचित कर दिया।

पांडेय के अधिवक्ता प्रसून कुमार कुंवर ने तर्क दिया कि बीपीएससी ने याचिकाकर्ता का पूरा पक्ष सुने बिना और केवल संपादित वीडियो के आधार पर आदेश पारित किया। यह आदेश न्यायिक प्रक्रियाओं और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था।
पटना हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि बीपीएससी ने याचिकाकर्ता की विस्तृत शो-कॉज रिप्लाई पर विचार नहीं किया और उसका आदेश बिना किसी ठोस कारण के पारित किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश में ठोस कारण दर्ज होना आवश्यक है, ताकि वह विधिसम्मत हो सके।
कोर्ट ने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई प्रशासनिक आदेश पारित किया जा रहा है, तो उसे पूरी तरह से पारदर्शी और कानूनी होना चाहिए। आदेश में किसी भी प्रकार का अभाव या अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए।
अंततः पटना हाई कोर्ट ने बीपीएससी द्वारा पारित डिबारमेंट आदेश को निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ता तारकेश्वर पांडेय को राहत दी। कोर्ट ने इस मामले को बीपीएससी के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश माना, जो आने वाले समय में प्रशासनिक आदेशों की पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता को स्पष्ट करता है।
यह निर्णय उन अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है, जो परीक्षा और चयन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के अनुशासनात्मक कार्रवाई से प्रभावित होते हैं।

