बिहार चुनाव में फिर नीतीश पर भाजपा की निर्भरता, स्थानीय नेतृत्व की कमी बनी चुनौती

नई दिल्ली, 23 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। दो चरणों में होने वाले इस चुनाव में भाजपा-जेडीयू नीत एनडीए और आरजेडी-कांग्रेस नीत महागठबंधन के बीच सीधी टक्कर है, जबकि प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ इस लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में है। एनडीए की कमान एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथ में है और भाजपा की निर्भरता उन पर अब भी कायम है।


बिहार के सियासी इतिहास पर नजर डालें तो 1990 तक यहां कांग्रेस का वर्चस्व रहा। 1950 के दशक में जनसंघ की शुरुआत के बावजूद भाजपा पूरे राज्य में मजबूत जनाधार नहीं बना सकी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल और उत्तर प्रदेश में लंबे समय से भाजपा शासन के बावजूद बिहार अब भी पार्टी के लिए ‘अभेद्य दुर्ग’ बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि के अनुसार, “बिहार में कम्युनिस्ट, समाजवादी और जनसंघ/भाजपा का उदय एक साथ हुआ, पर भाजपा ‘संपूर्ण बिहार’ की पार्टी नहीं बन सकी। नीतीश कुमार पर 20 वर्षों से निर्भर रहना इसका प्रमाण है।”
मणि बताते हैं कि शाहाबाद और मगध क्षेत्र समाजवादी और वामपंथी आंदोलनों के केंद्र रहे हैं, जहां भाजपा 2020 के चुनाव में सिर्फ दो सीटें जीत सकी। कोसी बेल्ट में नीतीश का प्रभाव बना है, जबकि लालू यादव अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव वोट बैंक पर टिके हैं। ऐसे में भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए नीतीश की साझेदारी की जरूरत पड़ती है।
1952 और 1957 के चुनावों में जनसंघ को एक भी सीट नहीं मिली थी। 1962 में पहली बार तीन सीटों पर जीत दर्ज हुई। 1967 में कांग्रेस विरोधी लहर के दौरान पार्टी को 26 सीटें मिलीं, जबकि 1977 में जनता पार्टी के रूप में जबरदस्त सफलता मिली। पर 1980 के बाद भाजपा को सीमित समर्थन ही मिलता रहा।
भाजपा की वास्तविक मजबूती नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ गठबंधन के बाद आई। 2005 में सत्ता संभालने के बाद से भाजपा ने राज्य में अपनी पकड़ बढ़ाई, लेकिन आज भी उसका अस्तित्व नीतीश पर निर्भर है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, “सुशील मोदी के बाद हमारे पास कोई प्रभावशाली चेहरा नहीं रहा। 2014 की मोदी लहर के बावजूद 2015 में हमें सिर्फ 53 सीटें मिलीं। 2020 में 74 सीटें जीतने के बावजूद मुख्यमंत्री पद नीतीश को देना पड़ा। अगर इस बार भी जेडीयू को 55–60 सीटें मिलीं, तो नीतीश ही फिर मुख्यमंत्री बनेंगे।”

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